साथी दूधनाथ

1982 में जनवरी में दूधनाथ जी से परिचय हुआ। वे फरीदाबाद में बाटा फैक्ट्री में मजदूर थे। मार्च 1982 में फरीदाबाद मजदूर समाचार का प्रकाशन आरम्भ हुआ और दूधनाथ जी इसमें सहभागी बने। इधर 17 मई को दूधनाथ जी की मृत्यु हो गई।

मजदूर समाचार का प्रकाशन लेनिनवादी आधार पर आरम्भ किया गया था। इसलिये यूनियनों को मजदूर संगठन के तौर पर लिया गया था। यूनियनों में मजदूर-पक्ष के नेतृत्व को स्थापित करना एक कार्यभार लिया गया था।

बाटा फैक्ट्री यूनियन एटक से जुड़ी थी। दूधनाथ जी एक सक्रिय कार्यकर्ता थे। एटक के प्रस्ताव अनुसार मध्य-1982 में बाटा यूनियन ने ठेकेदार कम्पनी के जरिये रखे वरकरों के मामले उठाये। बाटा फैक्ट्री गेट के बाहर यूनियन ने तम्बू गाड़ दिया। ठेकेदार कम्पनी के जरिये बाटा फैक्ट्री में रखे मजदूरों को यूनियन ने वहाँ बैठा दिया। सुबह की शिफ्ट आरम्भ होने और छूटने के समय यूनियन लीडर भाषण देने लगे। शिफ्ट छूटने के बाद दूधनाथ जी तम्बू में देर रात तक बैठने लगे। कहते थे कि बहुत मच्छर काटते हैं।

फैक्ट्री गेट पर बैठे कई दिन हो गये थे तब एक दिन सुबह अचानक बाटा यूनियन महासचिव ने घोषणा की कि यूनियन का धरने से कोई लेनादेना नहीं है। तम्बू का खर्चा यूनियन दे रही थी ….. दूधनाथ जी भड़क गये। अकेले ही वे यूनियन लीडरों का खुल कर विरोध करने लगे।

फिर अक्टूबर 1982 में बाटा मैनेजमेन्ट और यूनियन में दीर्घकालीन समझौते में फैक्ट्री में अपर सिलाई तथा जूते असेम्बली में सेमीऑटोमेटिक लाइनों के स्थान पर ऑटोमेटिक लाइनें स्थापित करना तय हुआ। बड़े पैमाने पर मजदूरों की छँटनी की बात मजदूर समाचार में भी उठी। यूनियन ने “शानदार समझौता” वाला पर्चा निकाला और विरोध करने वालों को यूनियनद्रोही तथा साम्राज्यवादी एजेन्ट कहा।

बाटा फैक्ट्री में ऑटोमेटिक लाइनें स्थापित कर दी गई। एक सेमिऑटोमेटिक लाइन पर एक शिफ्ट में 1660 जोड़ी के स्थान पर ऑटोमेटिक लाइन पर 2400 पेयर उत्पादन के लिये मैनेजमेन्ट और यूनियन ने कहा। लेकिन 1500 बाटा वरकर एक ऑटोमेटिक लाइन पर 1200-1300 जोड़ी बनाने लगे। दबाव बढाने के लिये मैनेजमेन्ट ने पैसे काटने शुरू किये। बाटा फैक्ट्री में 15 दिन में पेमेन्ट होती थी। पैसे काटते डेढ साल से ज्यादा समय हो गया तब भी मजदूर डग से मग नहीं हुये। ऐसे में 1985 में बाटा मैनेजमेन्ट ने फैक्ट्री में से ऑटोमेटिक लाइनें उखाड़ी और सेमिऑटोमेटिक लाइनें फिर लगाई।

मैनेजमेन्ट और यूनियन खुलेआम साथ थी। स्टाफ था और यूनियन के कुछ पठ्ठे भी थे। बाटा मजदूरों ने कोई नया नेतृत्व नहीं उभारा था। मजदूरों ने उस दौरान कोई मीटिंग भी नहीं की। समूहों में चर्चा भी नहीं की। किसी ने समझाया भी नहीं। किसी ने किसी को काम ढीला करने को कहा भी नहीं। फिर भी उत्पादन आधा , कम तनखा स्वीकार , डेढ साल … और यह 1500 मजदूरों द्वारा। हमारी समझ के बाहर था। कई बाटा मजदूरों से पूछा। कुछ भी पता नहीं चला। सोचा कि वरकर हम से छिपा रहे हैं। दूधनाथ जी से तो इस पर बहुत ज्यादा बातें हुई और छिपाने वाली बात बिल्कुल नहीं थी। फिर …. मजदूर समाचार के लिये यह अबूझ पहेली थी जो कि 2015 तक समझ से बाहर बनी रही। ग्लोब कैपेसिटर फैक्ट्री के एक टेम्परेरी वरकर ने 31 अक्टूबर 2015 को गुत्थी सुलझाई : यह मजदूरों का होना होता है जो उन्हें ऐसा करने में ले जाता है। इसमें न कोई छिपाने वाली बात होती और न कोई जादू होता। हिटलर की सरकार के समय जर्मनी में औद्योगिक उत्पादन में तीस प्रतिशत गिरावट वाली गुत्थी भी खुली।

पाकिस्तान से आये शर्णार्थियों के लिये फरीदाबाद में बाटा फैक्ट्री भी स्थापित की गई थी। आरम्भ से ही फैक्ट्री में यूनियन। एटक के एक केन्द्रीय लीडर बाटा यूनियन के प्रधान। बाटा वरकरों में से कार्यकारी प्रधान , महासचिव आदि। यूनियन नेतृत्व के लिये फैक्ट्री में दो ग्रुप एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते थे परन्तु दोनों ही प्रधान के लिये एटक केन्द्रीय नेता को रखते थे। ऑटोमेशन वाली एग्रीमेंट के बाद यूनियन चुनाव में प्रधान पद के लिये दूधनाथ जी खड़े हुये। एक बाटा वरकर ही खुल कर उनके समर्थन में। दूधनाथ जी के 403 वोट का एक असर यह हुआ कि एटक लीडर ने आगे चुनाव ही नहीं लड़ा , जीवन-भर बाटा यूनियन के चेयरमैन मनोनीत रहे।

फरीदाबाद में हर रूप-रंग की यूनियन के क्रियाकलापों के अनुभवों ने उनके मजदूर संगठन होने पर सवाल उठाये। अन्य स्थानों तथा पूर्व के अनुभवों-विचारों , खासकरके जर्मन-डच तथा इतालवी वाम , ने मजदूर समाचार में यह समझ उभारी कि फैक्ट्रियों में यूनियनें अब मजदूरों के संगठन नहीं हैं। बल्कि यूनियनें अब कम्पनियों के एक विभाग की तरह काम करती हैं। दूधनाथ जी भी इस विचार के थे और 1986 में शुरू की गई मजदूर समाचार की नई सीरीज में सक्रिय रहे।

1988 में बंगाल में बाटानगर फैक्ट्री में कम्पनी ने तालाबन्दी की। फैक्ट्रियों और दुकानों में काम करते बाटा वरकरों की फैडरेशन थी। तीन महीने चली तालाबन्दी के खिलाफ फैडरेशन की तीन दिन ऑल इण्डिया हड़ताल खबर बनी। फरीदाबाद फैक्ट्री में यूनियन ने लगातार ओवर टाइम काम में सहयोग कर कम्पनी की सहायता की। और , तीन दिन वाली हड़ताल में शामिल हो कर बाटानगर मजदूरों के साथ एकजुटता जाहिर की। दूधनाथ जी ने बाटानगर में तालाबन्दी के दौरान ओवर टाइम नहीं किया। उन्होंने ओवर टाइम करने से साफ-साफ मना कर दिया था।

मजदूर समाचार में सक्रियता के कारण दूधनाथ जी चिन्हित थे। बाटा मैनेजमेन्ट और यूनियन को वे बहुत अखरते थे। और सहकर्मियों के साथ मिल कर दूधनाथ जी बाटा फैक्ट्री में भी सक्रिय रहते थे। एक बार काम का बोझ बढाने का विरोध पूरी लाइन के वरकर कर रहे थे। लेकिन मैनेजमेन्ट ने छाँट कर रामप्रसाद जी और दूधनाथ को सस्पैण्ड किया। डॉमेस्टिक इन्क्वायरी। दोनों दोषी ठहराये। दोनों नौकरी से बर्खास्त। यूनियन ने केस लड़ने के लिये वकील देने की बात की। दोनों ने केस करने से मना कर दिया। सुबह शिफ्ट आरम्भ होने से पहले रामप्रसाद और दूधनाथ बाटा फैक्ट्री पहुँचने लगे। फैक्ट्री में जाते वरकरों से कोई बात नहीं होती थी पर हजार मजदूर फैक्ट्री में प्रवेश करते समय रोज उन्हें देखते हुये जाते। इस सिलसिले को पन्द्रह दिन हो गये तब तक मजदूरों की चुप्पी से बाटा मैनेजमेन्ट बहुत घबरा गई। कोई समझौता वार्ता नहीं हुई और बाटा कम्पनी ने बरखास्त वाले आदेश वापस ले लिये। रामप्रसाद जी और दूधनाथ जी को अपने ही विभाग में , सर्विस में बिना किसी ब्रेक के ड्युटी करने के पत्र दिये। और दोनों साठ वर्ष की आयु तक ड्युटी करने के बाद बाटा फैक्ट्री से रिटायर हुये।

दूधनाथ जी के दो युवा पुत्रों की दुखद मृत्यु से उन्हें गहरे आघात लगे थे। परन्तु नौकरी के दौरान और रिटायर होने के बाद भी दूधनाथ जी को जो ठीक लगता था उसमें वे सक्रिय होते रहे। मजदूर समाचार से सहयोग के लिये वे आधी रात भी तैयार रहे।

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