“मजदूर वर्ग क्या चाहता है?”

[यह लेख Angry Workers of the World (विश्व के गुस्साये मजदूर) द्वारा नियोजित एक चर्चा के लिए लिखा गया था जिसमें यूरोप और अमरीका और दूसरी तरफ भारत के वाम कार्यकर्ता किसान आंदोलन के विषय पर एकत्रित हुए।]

इस लेख द्वारा हम भारत में आज मजदूर वर्ग और उसके संघर्ष की क्या सामाजिक, राजनैतिक, और आर्थिक स्थिति है इसको दिखाना चाहेंगे। इसकी शुरुआत करने के लिए यह कहना जरूरी है कि पिछले कई समय से एक बहुत ही छोटी संख्या को छोड़कर भारत के अधिकांश मजदूर सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक जीवन और सामाजिक बेहसबाजी से अदृश्य हैं। इसे कई बार “इनफोर्मलाईज़ेशन ओफ लेबर” – श्रम का अनौपचारिकरण – कहा जाता है, जो कि गलत है। ऐसे कहने से एक धारणा बनती है कि यह कोई अस्वाभाविक और शासक वर्ग की ओर से नीच हरकत है, जबकि यह असल में एक बहुत ही स्वाभाविक चीज़ है। इस लिए इसे “इनविज़िबलाईज़ेशन ओफ लेबर” – श्रम के अदृश्यीकरण – के तौर पर देखना चाहिए, जो कि पूंजी का चरित्रात्मक पहलू है। समस्या यह है कि “तीसरी दुनिया” में श्रम पर लिखनेवाले, और साथ ही साथ यहाँ श्रम, श्रम कानून, यूनियन, संगठनों आदि से वास्ता रखनेवाले, मजदूर वर्ग को 20वी सदी के नजरिये से देखते हैं जिसमें सरकारों का हस्तक्षेप, त्रिदलीय समझौते, स्थायी मजदूरी, आदि तरीकों को लाया गया। इनका मक्सद मजदूरों में बढ़ते असंतोष को काबू में लाने का था, खासकर पूंजीवादी उत्पादन के केंद्रों में। भारत जैसे पूर्व औपनिवेशी स्थानों में इन्होंने एक किसानी-दस्तकारी बहुल इलाके में मजदूरी प्रथा को स्थिरता देने का काम किया। लेकिन आज जब संदर्भ बदल गया है पूंजी के लिए इन तरीकों का कोई मतलब नहीं। आज जब 90% श्रमिक अस्थायी हैं, जो कंपनी के लिए उत्पादन करते हुए भी कंपनी के श्रमिक नहीं हैं, जिनको समय समय पर ब्रेक दिया जाता है, या फिर जिनका काम ही आज है कल नहीं वाले चरित्र का है – इस संदर्भ में यह 20वी सदी का नज़रिया क्लासरूम बेहसों और टी वी डिबेटों को छोड़कार कोई महत्व नहीं रखता, बल्कि वास्तविकता पर परदा डाले रखने के ही काम आता है। यह कहा जाना चाहिये कि जो कीन्ज़वादी सुधारों का प्रारंभ 20वी सदी में पश्चिमी पूंजीवादी देशों में हुआ था, उनके चीथड़े आप भारत की हवाओं में खुलेआम उड़ते पाओगे, चाहे उन चीथड़ों को कितने ही लोग बटोरने का प्रयास करें।

मजदूर वर्ग का अदृश्यीकरण – 1

इससे हमारा मतलब है कि आज ऐसा कोई राजनैतिक दल या समाजिक संगठन नहीं है जो अधिकांश (अस्थायी) मजदूरों की तरफ से कोई प्रोग्राम आगे बढ़ाता है या फिर उनकी परिस्थिति को आधार बनाकर अपनी नीति तय करता है। इसका यह मतलब भी है कि अधिकांश मजदूरों का देशव्यापी राजनैतिक प्रक्रियाओं और मुहीमों से कोई लेना देना नहीं है।

उदाहरण के तौर पर, हमने एक साल पहले के लेख में दिखाया है किस तरह बहुसंख्यक मजदूरों का अपने काम करने के इलाके में कोई राजनैतिक अधिकार नहीं हैं।

सूरत (गुजरात) एक ऐसा शहर है जहाँ 58% आबादी बाहर से आकर काम करती है, याने कि स्थानीय आबादी से अधिक। वहाँ 70% वरकर स्थानीय नहीं हैं।”

ऐसी ही स्थिति सारे शहरों की है जहाँ लोग काम करने आते हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर शहरों के लिए कोई आँकड़े भी नहीं हैं कि वहाँ कितने लोग रहते हैं जिनके पास वोट डालने का अधिकार नहीं। इससे तत्काल राहत इन शहरों के मकानमालिक-भूमालिक-कोन्ट्रेक्टर वर्ग को तो मिलती है, राजनीति में अपना दबदबा बनाने के सतत प्रयास में रहते हैं। साथ ही साथ यह स्थिति वरकरों की तनखाएँ कम रखने में भी सहायक बनती है, क्योंकि वरकर शहर में स्थायी निवास और स्थायी खर्च का नहीं सोचते। लेकिन इसका यह भी मतलब है कि मजदूर कई बार महीने-दो महीने का किराया दिये बगैर बोरिया-बिस्तर उठाकर निकल भी लेते हैं, और साथ ही साथ मजदूर का काम के साथ कोई जुड़ाव नहीं बनता।

लेकिन अगर इस परिस्थिति को इसके व्यापक पहलू में देखें तो इससे दो बातें उभरती हैं। पहली बात यह कि बढ़ती तादाद में वरकरों की संचालन या काम देनेवालों से सीधी बात होती है। बिचौलियों पर निर्भरता या गाँव-धर्म-जात आदि के आधार पर जुड़ाव कमजोर होते जा रहे हैं। किसी सरकारी अफसर या पुलिसवाले को कभी कबार विवादों में शामिल करने पर अधिकतर समय तो बात मजदूरों के विपरीत ही जाती है। सो मजदूरों में एक व्यवसायिकता पायी जाती है जिसके तहत वे काम से काम रखते हैं, बेमतलब की बातों पर स्थायी लोगों से रिश्ते नहीं बनाते।

दूसरी बात, जो शायद इससे जुड़ी है, वह यह कि मजदूर प्रवास स्थान पर ऐसी राजनैतिक मुहीमों का हिस्सा नहीं बनते जिनमें उनके लिए कुछ रखा न हो। इसके कई हाल ही के उदाहरण हमारे सामने हैं।

2019 में सी ए ए विरोधी आंदोलन जो हुआ और 2020 में कृषि कानूनों को लेकर जिस आंदोलन ने तूल पकड़ा इनमें मजदूरों की गैरदिलचस्पी साफ दिखती है। इन दोनों आंदोलनों की जो माँगें थीं उनमें अधिकांश (अस्थायी) वरकरों के लिए कोई जगह नहीं थी। दिल्ली, जहाँ का हमारा अनुभव है, और जहाँ मजदूरों की बस्तियाँ और फैक्टरियाँ आंदोलन के स्थान के करीब थीं, वहाँ प्रवासी मजदूर इन आंदोलनों में बहुत ही छोटी तादाद में शरीक हुए। असम और अन्य जगहों (जैसे महाराष्ट्र ) – जिन्हें कई समय तक वाम समर्थन रहा है – में पहले भी यह साफ तौर पर देखा गया है कि मूलनिवासी या स्थायी लोगों के आंदोलनों के नाम पर सीधे सीधे प्रवासी मजदूरों को राजनैतिक अधिकार न देने की या प्राप्त अधिकार छीन लेने की बातें उभरी हैं (जैसा कि असम में एन आर सी के तहत हो ही रहा है)। इन मुहीमों में मजदूरों के खिलाफ़ हिंसा भी हुई है। यही बात अगर सी ए ए विरोधी आंदोलन में दिल्ली के संदर्भ में भी देखें तो उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसा समझने में आसानी होती है। यहाँ एक या दो पीढी से आकर बसे समुदायों ने, और उनके आपसे व्यवसायी रिश्तों ने जो स्थायी रूप लिये हैं, उसमें धर्म, जात, आदि की अहमियत अब भी बरकरार है। गुड़गाँव-फरीदाबाद-नोएडा जैसे शहरों के विपरीत यहाँ लघु-घरेलू उद्योग अधिक हैं , बड़ी इन्डस्ट्री बंद होने के कगार पर है। इससे यह समझने में कुछ मदद मिलती है कि गुड़गाँव-फरीदाबाद-नोएड़ा जैसी जगहों पर क्यों ना ही सी ए ए विरोधी आंदोलन फैला और ना ही हिंदू-मुसलिम हिंसा फैली।

वहीं 2021 में कोविड़ महामारी के दूसरे रुझान में जब वरकरों का घर लौटना फिर से शुरू हुआ, तब दिल्ली बोर्डर पर स्थित किसान आंदोलनकारियों की तरफ से मजदूरों को घर जाने के बजाये जलसे में शामिल होने का आहवान आयाii कई साथियों ने बताया है कि दिल्ली और आस पास के फैक्टरियों में मजदूरों में किसान आंदोलन को लेकर बहुत सारी चर्चा होती है। यह महत्वपूर्ण बात है । किसान आंदोलन की शुरुआत के दौरान कुछ संगठनों ने मजदूरों को वेतन और अन्य मुद्दों को लेकर वरकरों को संगठित करने का प्रयास भी किया थाiii लेकिन इन सब के बावजूद भी दिल्ली के मजदूरों ने इसके साथ अपना आंदोलन खड़ा नहीं किया। शायद इसके पीछे भी मजदूरों में व्यापक यह व्यवसायिक नजरिया है कि इससे क्या हासिल होगा। इससे ये भी समझ आता है कि अब तक मजदूरों में एक व्यापक वर्ग के तौर पर कोई माँग आगे नहीं है, जिसके कारणों में आगे जा सकते हैं। उनकी परिस्थिति महाराष्ट्र के भूमिहीन “किसानों” की तरह नहीं जो फोरेस्ट राईट एक्ट (2006) के तहत जमीनों पर पट्टा माँगने के उद्देश्य से किसान आंदोलन से जुड़ने दिल्ली पहुँचे। पिछले कई समय से महाराष्ट्र में कृषि मजदूरों में फोरेस्ट राईट एक्ट के तहत जमीन पर कानूनी अधिकार प्राप्त करने की मुहीम चल रही है, जिसमें 5-10 एकड़ जमीन मिलने की उम्मीद है।iv इसका नेतृत्व कई बार मालिक किसानों की पार्टी अखिल भारतीय किसान सभा करती है, जो बंबई-नागपुर इत्यादि बड़े शहरों में एक दिवसीय रैलियाँ निकालने तक का सहयोग देती हैं। इस बार किसानों के कुछ समूह बंबई में भी धरना जमाने पहुँचे जहाँ कलेक्टर ओफिस और रिलायंस इन्डस्ट्रीज़ का हेड ओफिस अगल बगल में ही है।v किसान पार्टियों ने उन्हें वहाँ से हटने और दिल्ली में स्थित आंदोलनकारियों का समर्थन देने के लिए कहा। याने कि साफ है कि तमाम आंदोलन जिस राजनैतिक स्थान पर अपने आप को खड़ा कर रहे हैं, उसका ध्यान मूलतः सत्ता की उठापटक तक ही सीमित है, और इस लिए भी मजदूर वर्ग के लिए उनकी कोई तत्काल अहमियत नहीं।

इसके वरन मजदूरों का वर्ग संगठित रूप बनने में बिलकुल भी देर नहीं लगी जब पिछले साल 2020 में भारतीय सरकार ने देशव्यापी तालाबंदी की घोषणा की। एक हफ्ते में ही जगह जगह मजदूरों के समूह सड़क पर निकल आये, पहले विनम्र अपीलें की कि उन्हें घर जाने दिया जाये, और फिर जब इन अपीलों पर भी राजनैतिक चुप्पी ही बनी रही तब वरकरों ने रौद्र रूप लेकर अपना राजनैतिक विरोध दर्ज किया। इसका प्रभाव इतना ताकतवर रहा कि ना ही केवल सरकार की घोषित तालाबंदी चूर-चूर हो गई, बल्कि सरकार ने 2021 में दूसरे रुझान के समय देश में यातायात पर कोई रोकटोक नहीं लगाई। मार्क्स जिसे मजदूरी का मुक्त-श्रम चरित्र कहते हैं – श्रमिक के लिए श्रम बेचने की आजादी -यह उसका एक बहुत ही बेहतरीन उदाहरण रहा।

मजदूर वर्ग का अदृश्यीकरण – 2

सूरत के बारे में शोध बताती है कि वहाँ के 98% वरकरों ने कभी किसी सरकारी अफसर – पी एफ अफसर, लेबर अफसर, पुलिस अफसर – से बात नहीं की है। यह अन्य जगहों पर भी दिखता है कि मजदूरों का व्यव्हार सीधे सीधे काम देनेवालों से ही होता है। समस्या निवारण के औपचारिक जरियों से मजदूर अधिकतर तो दूरी बनाये रखते हैं। इस लिए मजदूरों के विरोध का चरित्र भी सीधा-सीधा होता जा रहा है, और सरकारी या अन्य औपचारिक जरियों द्वारा विरोध जताना असंगत होता जा रहा है।

मजदूरों का ऐसी कंपनी के लिए काम करना जो उन्हें अपना मजदूर नहीं मानती वर्तमान उत्पादन पद्धति के आधार में है। ये ठेकेदार द्वारा रखे गार्मेन्ट और ऑटो उत्पादन में लगे मजदूरों पर भी उतना ही लागू होता है जितना स्विगी-ज़ोमाटो-ऊबर-ओला-एमेज़ोन के “एसोसियेट” पर।vi इसे भारत की विशेषता देखने के बजाये आज के वैश्विक पूंजीवादी तौर-तरीके की तरह देखना अधिक बेहतर होगा।

पिछले तीस सालों में दक्षिण एशिया में मजदूर वैश्विक मंडी के साथ पहले से बहुत ज्यादे स्तर पर जुड़े हैं। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ 2000 में भारत का वैश्विक निर्यात 60 अरब अमरीकी डोलरों का था (और जीडीपी का 13% था), आज यह निर्यात 528 अरब अमरीकी डोलर (और जीडीपी का 19% ) है।vii एक तरफ जहाँ इस बदलाव ने समाजिक गति को और तेज़ कर दिया है, और बढ़ते उत्पादन ने समाज में कई राजनैतिक और सांस्कृतिक बदलाव किये हैं, वहीं इन बदलावों में अब भी दो बातें साफ़ हैं: 1) मध्य वर्ग का संगठित रूप से आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर हावी होना और 2) इस मध्य वर्ग द्वारा मौजूदा राजनैतिक दलों और सरकारी तंत्र को और मजबूती देने की माँग। इस परिस्थिति को मौजूदा शासक वर्गीय संगठन के और मजबूत होने के तरह ही देखा जाना चाहिये, यहाँ ज्यादा कुछ नया निकल कार आया है ऐसी बात नहीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैश्विक पूंजीवादी फैलाव, मध्य वर्ग के उभार, और राज्यतंत्र के मजबूत होने में मजदूरों को व्यापक स्तर पर उत्पादन के लिए संगठित करने के बावजूद उनके व्यापक सामाजिक या राजनैतिक पक्ष नहीं बने हैं। इसकी सबसे सीधी झलक इस बात में दिखती है कि मजदूरों द्वारा आक्रमक विरोधों के अधिकांश उदाहरण फैक्टरी स्तर के ही हैं, एरिया स्तर के आक्रमक विरोध कम देखने को मिलते है। इसके और भी कारण हैं।

हालांकि उत्पादन मजदूरों की तनखाएँ पिछले 30 सालों में प्रतिशत के हिसाब से बहुत अधिक बढ़ी हैं, दूसरी तरफ मध्य-वर्गीय तनखाएँ – चाहे मजदूर श्रेणी की या संचालक श्रेणी की – अधिक मात्रा में बढ़ी हैं। फाईनेन्सियल टाईम्स की एक रिपोर्ट अनुसार मात्र पिछले 5 सालों में भारत में औसतन सालाना तनखा 980$ (72,000 रुपयों) से करीब 1200$ (94,000 रुपयों) तक बढ़ी है। इसी दौरान गुड़गाँव-फरीदाबाद-नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन में शामिल वरकरों की तनखाएँ करीब 900$ (68,400 रुपयों) से बढ़कर करीब 1300$ (1,08,000 रुपये) हो गई है। यानी कि लगभग 70% की बढ़त। अगर यही अनुमान पिछले 10 सालों का लगाते हैं तो मजदूरों की तनखाएँ लगभग 200% बढ़ी मिलती हैं।

दूसरी तरफ जिसे मध्य-वर्ग कहा जाता है उसमें आपसी ऊँचनीच बहुत ज्यादा है। मकिंसे वैश्विक संस्था के हिसाब से 2 लाख से 20 लाख कमाने वाले लोग मध्य वर्ग में आते हैं। हुरुन इन्डिया की एक रिपोर्ट के हिसाब से 40 लाख कमाने वाले (और 5-7 करोड़ रुपयों की संपत्ति जमा करनेवाले) घरों की संख्या भारत में पिछले 20 सालों में बहुत तेजी से बढ़ी है। यानि कि इस तबके को वे “नया मध्य वर्ग” कहते हैं। इससे साफ होता है कि मध्य-वर्ग और कुछ नहीं बल्कि फोरमैन-सरकारी वरकर-निछली मैनेजमेन्ट-पूंजीवादी किसान-सोफ्टवेयर एन्जिनियर-डिज़ाईनर-कंटेन्ट क्रियेटर आदि और संचालक तबके के लोगों से बना समूह है जो अपनी स्थिति मजदूरों से बेहतर देखता आ रहा है। इस तबके ने मुख्यतः उत्पादन के ज़रियों में वैश्विक क्रांति के बल पर अपनी आमदन बढ़ाई है, और साथ ही साथ इस प्रक्रिया ने भारत में भूमि पर निर्भर तबकों की – छोटे किसानों, दस्तकारों, और कृषि मजदूरों की – विवशताएँ बढ़ाकर उनको मजदूरी की ओर बढ़ती मात्रा में ढकेला है।

मजदूर और पूंजीवाद

विश्व युद्धों के दौर से ही वैश्विक पूंजीवाद में ऐसी समस्याएँ उभरी हैं जिनका निवारण सोचना तो दूर की बात, जिन्हें और बड़ी समस्याओं से ठीक करने के प्रयास रहे हैं। सरकारों के बढ़ते कर्ज, कंपनियों के लिए बेतुकी कर्ज माफ़ियाँ, पैसे के दाम पर सरकारी नियंत्रण, तेल-अनाज या अन्य वस्तुओं के दाम पर राजनैतिक दाँव-पेंच…..साथ ही साथ समस्त उत्पादन का एक उल्लेखनीय हिस्सा समाजिक असंतोष को कम रखने के लिए देना।

2008 की वैश्विक गिरावट के बाद धन के निवेश से मुनाफा खींचने की प्रक्रिया ने और तूल पकड़ा है, मानों किसी मरते मुर्गे से जितने अंडे हो सके निकालने के लिए। इसके चलते एक बहुत ही भ्रष्ट सरकारी-कंपनी तंत्र भी वैश्विक स्तर पर उभरा है, और साथ ही साथ प्रकृति का दोहन भी अपूर्व दर से बढ़ा है। उदाहरण के तौर पर, चीन के मुकाबले बहुत ही कम उत्पादन करने के बावजूद भारतीय शहर चीन से अधिक प्रदूषित हो चुके हैं।

दूसरी तरफ पूंजी के लिए भारत में कुछ समस्याएँ भारत की ही विशेष रही हैं। वोल-स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 50% श्रमिक आबादी पूर्ती-वितरण प्रणाली में काम करती है, और इनमें से एक बहुत ही छोटा तबका आधुनिक मशीनों पर (जैसे कि फोर्कलिफ्ट, आदि) काम करता है। यानि कि अधिकांश पूर्ती-वितरण के मजदूर हाथ से या साईकिल से या थोड़े बहुत खटारा मशीनों पर काम करते हैं। उत्पादन के जरियों का विकास, और पूर्ती-वितरण के जरियों की दुर्गति – इसका नतीजा हमें कोविडकाल की समस्याओं में बखूबी दिखा जहाँ सामान का आवागमन ही ठप्प हो चला। यदि भारत का संचालक वर्ग पूर्ती-वितरण के सवाल पर इतना सुस्त है – और इसमें भारत की विभिन्न सरकारें भी आती हैं, जिनका अब तक कृषि के क्षेत्र में पूर्ती-वितरण पर कब्जा सा ही रहा है – तो मजदूरों के रहन-सहन आदि का हाल तो और भी बदतर है। इसका भी नतीजा कोविड-मंदी के काल में बखूबी देखने मिला, जहाँ उत्पादन-पूर्ती में अड़चनें आने पर मजदूरों का घर चला जाना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन चुका है। अस्थायी मजदूरों का घर जाना वैसे भी उत्पादन-चक्र से जुड़ा ही रहता। लेकिन अब इसका नतीजा दिल्ली-चेन्नई जैसे बड़ी उत्पादन शहरों में व्यापक लेबर-शोर्टेज के रूप में देखने मिल रहा है, जहाँ 20-30% कम वरकर बचें हैं,(viii) और कुछ जगहों पर रिपोर्टों के मुताबिक औसतन दिहाड़ी भी बढ़ रही है।(ix)

स्वाभाविक है कि इस प्रक्रिया में जो मध्यवर्ग के निम्न तबके हैं, उनका भी मजदूरीकरण बहुत तेजी से होता जा रहा है। सरकारों की तरफ से एक तरफ 20वी सदी की पूरी तथाकथित कल्याणकारी कीन्ज़वादी प्रणाली तोड़ने का प्रयास तो लगभग खत्म ही है, लेकिन उसके बावजूद जो समस्याएँ इस वक्त वैश्विक और स्थानीय पूंजी की हैं उनसे बाहर निकलने का कोई रस्ता नहीं दिख रहा। इस लिए जिस राष्ट्रवादी, पेहचानवादी विचारधारा पर राजनीति को बचाया जा रहा है, वह भी बढ़ते तौर पर नाकारा हो रही है।

मजदूर वर्ग के सामने आज दो स्तर पर सवाल हैं – 1) उनका बढ़ती दर से अतिरिक्त आबादी बनता जाना और 2) प्राचीन उत्पादन-वितरण प्रणाली पर पैर जमाये भारतीय संचालक वर्ग को और भी ज्यादा नाकारा करना। संभवतः अगर मजदूरों में यह दो सवाल स्फूर्त रूप से घर कर देते हैं, तो उनके कदम दक्षिण एशिया की राजनीति ही नहीं, यहाँ का भुगोल भी बदल सकते हैं। और इसके साथ साथ संचालक वर्ग के नेतृत्व में प्रकृति का तेज़ खात्मा तो प्रश्न के तौर पर हमारे सामने है ही।

ihttps://kaamsechhutti.home.blog/2020/06/01/%e0%a4%89%e0%a4%a0%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%a6%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%94/

iihttps://timesofindia.indiatimes.com/city/amritsar/kisan-morcha-urges-migrants-not-to-go-home-but-join-delhi-protest/articleshow/82173055.cms?utm_source=twitter.com&utm_medium=social&utm_campaign=TOIMobile

iiihttps://scroll.in/article/989447/beaten-not-broken-meet-shiv-kumar-and-nodeep-kaur-young-labour-activists-inspired-by-bhagat-singh

ivhttps://indianexpress.com/article/cities/mumbai/small-marginal-tribal-farmers-and-labourers-from-state-gather-missing-protest-was-not-an-option-7161656/

vhttps://www.mumbailive.com/en/civic/farmers-hold-day-long-protest-at-bkc-59443

vihttps://inc42.com/infocus/year-end-review-2020/from-swiggy-to-ola-a-year-of-protests-by-indias-gig-workers/

viihttps://tradingeconomics.com/india/exports

viiihttps://timesofindia.indiatimes.com/city/bengaluru/karnataka-stares-at-another-labour-crisis-amid-surge-in-covid-cases/articleshow/81980568.cms

https://timesofindia.indiatimes.com/city/chennai/tamil-nadu-housing-sector-hit-hard-by-second-wave/articleshow/83080041.cms

https://timesofindia.indiatimes.com/city/chennai/guest-workers-are-in-no-mans-land-all-over-again/articleshow/82508136.cms

https://www.hindustantimes.com/india-news/no-jobs-fear-of-third-wave-may-keep-migrants-away-101621987465604.html

ixhttps://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/temps-wages-surge-30-on-labour-shortage/articleshow/82020999.cms

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