किसान आंदोलन की वर्तमान अहमियत

Harrowing time for motorists amid farmers' protests in Haryana
दिल्ली सीमा पर ट्रैक्टर और बैरिकेडों की झड़प। Photo PTI

किसान आंदोलन की अहमियत

यह बात कई दोस्तों ने ध्यान में लाई है कि किसानों का आंदोलन बेशी मूल्य पर ही कब्जे का आंदोलन है। इस बात में कोई संदेह नहीं है। यह भी कहना सही ही होगा कि आंदोलन में जो माँगें रखी गई हैं, उनका उद्देश्य वर्तमान स्थिति को बरकरार रखना है। भले ही यह पूंजी पर महँगा पड़ेगा, और उस हिसाब से अच्छा है, मगर यह ना ही छोटी जमीनों वालों के जीवन स्तर को गिरने से रोकेगा, ना ही समाज को नई दिशा देगा। मगर सिर्फ इतना कहना काफी नहीं। यह हर कोई जानता है कि छोटे और मध्य किसान बड़ी कंपनियों जितना बेशी मूल्य नहीं बना सकते। इस लिए वे पूंजी से टकराव में हैं। साथ ही साथ इस आंदोलन के चलते पहली बार बड़ी पूंजी की मुनाफाखोरी का मुद्दा अखबारों के पहले पन्ने पर आया है। इस लिए इस आंदोलन के जज़्बे पर मजदूर वर्ग की आँखें भी टिकी हैं, इसमें दो राय नहीं हो सकती। यहाँ यह याद रखना चाहिए कि वर्तमान मजदूर वर्ग के एक बड़े हिस्से ने भी हाल ही में जमीन से विस्थापन को अनुभव किया है, इस लिए यह आंदोलन उनके मजदूरीकरण की झलक देता है।

विश्व में छोटी और मध्य किसानी

भारत विश्व के उन इलाकों में से है जहाँ छोटी जमीनों वाले किसानों की आबादी बहुत ज्यादा है। मगर वैश्विक स्तर पर छोटी और मध्य स्तर की किसानी 20वी सदी की शुरुआत से खतरे में थी। इसके कारण छोटे और मध्य स्तर के किसान अधिकाधिक संकट में पड़े और उनके गुस्से ने सामाजिक रूप लिया। इस गुस्से का सबसे बड़ा प्रतीक विश्व में चीन है, जहाँ किसानों की बग़ावत को एक संगठित ढ़ाँचा मिला। इस गुस्से को ठंडा करने के लिए दुनिया भर की सरकारों ने कल्याण के बहाने ऐसी नीतियाँ बनाईं जिनसे देसी किसानों को वैश्विक कृषि की प्रतिस्पर्धा झेलनी न पड़े। भारत में अकाल और बड़ी तादाद में भुखमरी के अनुभव ने भी सरकारों को छोटी किसानी का संकट संभालने पर मजबूर किया। साथ ही साथ एक संकट भूमीहीन मजदूरों की बग़ावत का भी था। सरकारों ने न्यूनतम बिकरी दाम तय कर, राशन वितरण प्रणाली बना कर, और मंड़ी व्यवस्था को सरकारी नियंत्रण में रख कर इन समस्याओं से जूझने का प्रयास किया।

किसानों का मजदूरीकरण

यह ध्यान में रखना चाहिए कि इन नीतियों ने ही भारत जैसी जगहों को “कृषि प्रधान” बनाये रखने में मदद की है, चाहे कृषकों के अंदर ही आपसी ऊँच-नीच कितनी ही बढ़ गई हो, और चाहे अधिकतर किसानों के जीवन हालात कितने ही बिगड़े हों। पूंजी के पास पड़ा अतिरिक्त ना ही अधिक दाम के रूप में, साथ ही साथ सबसिडी, कर्ज माफी जैसी नीतियों में कृषकों के गुस्से को ठंडा रखने लगाया गया। खराब मौसम, घटती उपज, और घटते जमीन के आकार से ग्रस्त अधिकतर किसान गरीबी की ओर ही बढ़ते गये, मगर धीमि गति से। अधिकतर मजदूर ही बने। जो नहीं बने वे सरकारी मदद पर निर्भर हो गये, और चुनावी राजनीति में फँस गये। ज्यादातर किसानों के जीवन का स्तर घटता चला गया, और किसान परिवारों की नई पीढियों मेंं कुछ शिक्षा लेकर पेशों मे, और अधिकतर मजदूरी में उतरते चले गये।

किसानी को दिये गये सरकारी प्रावधानों का ही परिणाम रहा एक अद्भुत वर्ग ढ़ाँचा – भारत के अमीर और मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग के बीच एक बड़ा किसान वर्ग बना रहा। छोटे और मध्य किसान कुछ मजदूरों को काम पर लगाते ही रहे हैं, मगर गिरती आमदनी के चलते मजदूरों को लगाये रखने में भी मुश्किलें झेल रहे हैं।

सरमायेदारों से लोगों का गुस्सा संभल नहीं पा रहा

स्थिति यह है कि एक तरफ पूंजी नये क्षेत्रों की तलाश और उस पर कब्जे के फिराक में है तो दूसरी तरफ मंदी के चलते नकदीकरण का संकट सरकारी खर्च को घटाने की ओर प्रेरित कर रहा है। ऐसे में किसानों का आंदोलन सीधे-सीधे यह दिखाता है कि तथाकथित कल्याणकारी नीतियाँ कितनी निक्कमी थीं, जो किसानों को मजदूर बनने से न तो रोक पायी और न रोक पायेगी। वस्तु स्थिति यह बताती है कि कुछ पैसे फेंककर सामाजिक प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता और न लोगों के गुस्से को ही संभाला जा सकता। यह इस-उस पार्टी की बात नहीं, यह इस-उस सरकार की बात नहीं।

गिरती औद्योगिक सभ्यता का मृत्यु गीत

हालांकि आंदोलन की माँगों को देखकर यह साफ है कि यह मजदूरों की लड़ाई सीधे तौर पर नहीं है, लेकिन किसानों पर से पूंजी का हटता हाथ दिखाता है कि उनका मजदूरीकरण और तेज होगा। पूंजी कृषि चलाना चाहती है और किसानों को मजदूर बनाना चाहती है। इतना साफ है कि समाज में संघर्ष और बढ़ रहा है और आनेवाला समय पूंजी के साथ सीधे टकराव वाला समयय होगा, ना कि कल्याणकारी आँखमिचोली का। किसी ने सही कहा है कि इतिहास अपने आप को बार बार दोहराता है, चाहे किसी चुटकुले के ही रूप में। ऐसा दौर चल रहा है जिसमें से मजदूरी प्रथा खत्म हो रही है, लेकिन इसके बीच भी औद्योगिक सभ्यता के केंद्र में बैठे नीति-निर्माता लोगों को मजदूर के ही भेस में देखना चाहते हैं। इस लिए जो लोग यह कह रहे हैं कि दिल्ली दोबारा से मुघलों का सा व्यव्हार कर रही है, वे ठीक कह रहे हैं – छूटती गद्दी को बचाये रखने का प्रयास। ऐसे दौर में प्रवेश करने के लिए किसानों की मुक्त, एक जुट आवाज़ से बेहतर और क्या हो सकता है जो दिल्ली के चारों ओर से पूर विश्व भर में फैल रही है?

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