उठे सबके कदम – कोरोना-मंदी, और तालाबंदी के दौर में मजदूर वर्ग का उभार

सामाजिक दरारों पर से पर्दा हट चुका है। नया करोनावायरस या कोविड-19 ने सिर्फ सूत्रधार का काम किया है। कहानी है मंडी मुद्रा के दायरे से छुटकरा पाते मानव समाज की।

मुख्यतः यह दरार मजदूर वर्ग और संपन्न समाज के बीच की है। मगर इसका चरित्र बहुआयामी है। मंडी मुद्रा का भारत के भिन्न जगहों पर भिन्न तरह से फैलाव, और उसकी क्रियाशीलता, और उसका टूटना यह इतनी तेजी से सामने आयी हैं कि इस बहुआयामी चरित्र का एक जगह पर वर्णन और विशलेषण करना बहुत ही रोचक और प्रकाशपूर्ण कार्य है।

इस लेख में कोशिश यही होगी कि भिन्न स्थानों पर मजदूरों के व्यवस्था के विरुद्ध टकराव, मजदूरों के स्व-संगठन, और उनकी सामूहिक मजबूती पर प्रकाश डालें और उनके द्वारा परिस्थितियों को गहराई से समझने का प्रयास करें।

इससे इस वक्त के ज्वलंत सवाल का जवाब ढूँढना संभव हो सकता है – आगे क्या?

इस काम के लिए नीचे दी गई रूपरेखा के अनुसार बात होगी –

  1. लौकडाऊन का आरंभिक समय
  2. कंपनियों की डूबती कश्तियाँ – वेतन की चोरी, हड़तालें, मारपीट, इत्यादि
  3. खुले में टकराव और मजदूर वर्ग में बढ़ता सामाजिक एहसास
  4. अपने वजन तले धंसती कंपनियाँ
  5. मंडी मुद्रा के पुनरोत्पादन की अबूझ पहेली और निवारण लापता
  6. पलायन नहीं, मजदूरों की पूर्ण सामाजिक हड़ताल

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(a) लौकडाऊन का आरंभिक समय

लौकडाऊन के पहले की बात है। कंपनियों और मजदूरों के बीच होते विरोध अधिकाधिक बढ़ते जा रहे थे। उद्योग के कई क्षेत्रों में प्रोडक्शन स्लो या बंद पड़ रहा था। ओटो उद्योग में उत्पादन घट रहा था। नवंबर 2019 में होन्डा दुपहिया, माणेसर (गुड़गाँव के पास) में करीब 500 वरकरों की छटनी के बाद वरकरों ने 13 दिनों तक शोपफ्लोर पर डेरा जमा कंपनी का कब्जा हटाया। होन्डा की लाईनों पर प्रोडक्शन केवल कम ही नहीं हुआ था, वहाँ एक लाईन भी बंद हो गई थी। एक शिफ्ट भी खत्म करने की बात चल रही थी। ऐसे में निकाले जा रहे वरकरों को कहा गया कि फरवरी में फिर रख लेंगे। दो-पाँच-दस-पंदरह साल से काम कर रहे अस्थायी वरकर फैक्टरी के अंदर और बाहर डेरा जमा लिए। मैनेजमेंट के साथ सारी बातचीत सामूहिक। मैनेजमेंट के फरवरी के वादों पर पानी फेर अस्थायी वरकरों की सरल माँग – जितने साल काम किया है, प्रति साल हमें एक-एक लाख रुपये दिये जायें। इसकी रिपोर्ट यहाँ दी है।

– होन्डा, मारूती, बजाज जैसी बड़ी कंपनियों में काम घटने के साथ साथ छोटी वेन्डर कंपनियों पर भी असर पड़ा। माणेसर की ही एक नवंबर 2019 की रिपोर्ट ये देखिये – स्टैनली मोल्डिंग की दो शिफ्ट में 1200 वरकर, 10,500 तनखा। अधिकतर ओपरेटर। होन्डा के लिए एन्जिन पार्ट मोल्डिंग मशीनों पर बनाते थे। तीन रोज़ पहले कंपनी बंद हो गई, सारे 1200 वरकरों को बोला जब काम होगा बुला लेंगे।

– गार्मेंट उद्योग में भी पिछले 6 महीनों से माँग की कमी महसूस हो रही थी। उद्योग विहार, गुड़गाँव के गार्मेन्ट उद्योग के प्रतिनिधियों ने 2019 को एक बहुत बुरा साल बताया थाi, और कई वरकरों की छुट्टी कर दी थी। असल में कई समय से कंपनियों के बिक्री विभाग या स्वाधीन विक्रेता कह रहे थे कि विदेश में बहुत भारी तादाद में खरीददारों की दुकाने बंद हो रही हैं, तो इससे उत्पादन घटना भी स्वाभाविक है।

– गुजरात के सूरत शहर में स्थित हीरों की सफाई-पोलिशिंग का काम पिछले एक साल से अधिक से कम हो रहा है। सितंबर 2019 में एक हफ्ते में 15,000 नौकरियाँ खत्म होने की रिपोर्ट आयी थी।ii

– यहाँ मूल बात यह है कि लौकडाऊन के पहले से ही वैश्विक मंदी के चलते वरकरों का कंपनियों के साथ रिश्ता चरमरा रहा था

जब लौकडाऊन घोषित हुआ, तो कंपनियों ने सामान्यतः बंद होने में कुछ तीन-चार दिन लगाये। जिस तरह फिल्मों में काल्पनिक गोली लगने की वजह से कोई जखमी होने की एक्टिंग करता है, उसी तरह कंपनियों ने कई समय से हुई ढ़ीली हालत के लिए करोना वायरस को जिम्मेदार ठहराया। आरंभिक दिनों में कंपनियों या सरकारों को इस समस्या का अंदाजा नहीं लगा। करोना वायरस का भय फैलने के कारण सबको घर में ही रहने का आदेश मिला। वरकरों के पास पर्याप्त व्यवस्था ना होना एक बात है, अनिश्चितकालीन लौकडाऊन में अन्जान जगह पर होना भी वरकर नहीं चाहते थे।

उन्होंने चलना शुरू किया।

यहाँ कुछ आँकड़े देखिये – भारत के बड़े उत्पादन स्थानों में काम करने आये वरकरों की संख्या 10 करोड़ बतायी जाती है। सूरत एक ऐसा शहर है जहाँ 58% आबादी बाहर से आकर काम करती है, याने कि स्थानीय आबादी से अधिक। वहाँ 70% वरकर स्थानीय नहीं हैं। फिर भी 98% वरकरों की कभी किसी सरकारी अफसर से मुलाकात या वार्ता नहीं हो पायी है। बेंगलुरु के गार्मेन्ट उद्योग के एक प्रतिनिधि का मीडिया को बयान – “हमारे 30% श्रमिक घर लौट रहे हैं।”iii महाराष्ट्र से करीब 11.5 लाख मजदूर ट्रेनों द्वारा घर चले गये हैं, जिनमें से 8 लाख केवल मुंबई से लौटे हैं।iv और इसके पहले ना जाने कितने अपने आप घरों को चलके, दौड़के, साईकिल से, नाव से, टेम्पो इत्यादि से घर चले गये हैं। दिल्ली, जिसका अनुमान लगाया जाता है कि 63 लाख लोग यहाँ पिछले 20 साल में बाहर से आकर बसें हैंv, पिछले एक हफ्ते में केवल 2 लाख 40 हजार लोगों को ही ट्रेन द्वारा भेज पायी है।vi इससे कई अधिक संख्या उसके पहले खुद ही पैदल निकल गयी। हम यह भी ध्यान में रखें कि दिल्ली के आसपास नोएडा, गाजियाबाद, गुड़गाँव, फरीदाबाद, बहादुरगढ़, सोनीपत, पानीपत जैसी बहुत जगहें हैं जहाँ से मजदूर चल कर वापस लौटे। देश के अन्य कई हिस्सों से मजदूर चलते चलते घर लौटे।

उस वक्त पुलिस ने वरकरों को रोकना चाहा, लेकिन इतने सारे वरकरों के समूहों को रोकना मुमकिन न था। लौकडाऊन तार-तार हो गया। मगर जब यह समझ आया कि शहर में आया हर वरकर घर लौटना चाहता है, तब सरकारों और कंपनियों को अंदाजा हुआ कि इसके बाद श्रम की कितनी बड़ी किल्लत होने को है

इससे उनकी समस्या दोगुनी हो गई – पहले से मंदी छाई है, तो उत्पादन का अवसर नहीं; लेकिन मान लो अगर उत्पादन का अवसर आ भी जाता है, तो उत्पादन के लिए मजदूर नहीं बचेंगे।

अन्य शब्दों में, वरकरों के लौटने ने औद्योगिक महौल बिगाड़ दिया।

कंपनियों के ऊपर तबाही के बादल मंडरा रहे हैं। उस समय से सरकारें और उद्योग संचालक किसी न किसी तरह से वरकरों को शहरों में कैद रखना चाह रहे हैं, लेकिन वे अधिकाधिक नाकाम होते जा रहे हैं।

(b) कंपनियों की डूबती कश्तियाँ वेतन की चोरी, हड़तालें, मारपीट, इत्यादि

लौकडाऊन होते ही कई जगहों पर मजदूरों और कंपनियों के अंदरूनी झगड़े बाहर फूटे।

– अप्रैल 28 को सूरत के डायमंड बूर्स कार्यलय के बाहर वरकर जमा हुए और उन्होंने कार्यालय और मौजूदा पुलिस पर हमला बोला। यह निर्माण वरकर थे, और इनका आरोप था कि लौकडाऊन के दौरान भी संचालक निर्माण काम जारी रख रहे थे, और उनके काम से मना करने पर प्रबंधक अन्य वरकरों से काम करवा रहे थे।vii

– वहीं चेन्नई के अयनमबक्कम में निर्माण कार्य कर रहे 350 वरकरों को कंपनी ने दो महीनों की तनखा नहीं दी। आधार कार्ड न होने की वजह से सरकार द्वारा दिया जानेवाला खाना भी 25 वरकरों के लिए बंद हो गया। तो 14 अप्रैल के दिन वरकर बाहर रस्ते पर जमा हो गये। किसी का 40 हजार बकाया तो किसी का 80 हजार बकाया।

– 8 मई को कठुआ (जम्मू) के चेनाब टेक्स्टाईल मिल्स के करीब 6000 वरकरों ने कंपनी के सामने डेरा जमा लिया। उनकी माँग थी कि उन्हें उनका पूरा वेतन दिया जाये ताकि वे घर रवाना हों। जब पुलिस ने गर्मी दिखायी तो वरकरों ने पुलिस पर पथराव किया, गाड़ियाँ तोड़ी, पठानकोट राजमार्ग जाम कर दिया। वरकरों को वेतन की आधी राशी ही मिली, और 14 मई को फिर से जब जमा हुए, पुलिस ने बंदोबस्त के साथ उन पर हमला किया और कईयों को डिटेन कर लिया। उस समय से अधिकतर वरकर घरों के लिए रवाना हुए। कंपनी प्रबंधक – “मार्च में उत्पादन हुआ नहीं था, हम कैसे तनखा देते?”viii

मीडिया में लिखने वाले यह सवाल कर रहे हैं – “लौकडाऊन के कारण क्या हुआ ?” हमारा सवाल है कि वरकरों और कंपनियों के बीच ऐसे कौनसे तनाव चल रहे थे जिसके बीच में लौकडाऊन हुआ ?

वरकरों के घर लौटने को सिर्फ एक सतत चल रही घटना की तरह देखना गलत होगा। वरकरों ने कब और किस परिस्थिति में वापस लौटने का निर्णय लिया, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनका कंपनी के साथ क्या लेन-देन बाकी था। हमने देखा कि होन्डा और उसकी वेन्डर कंपनियों, या उत्पादन कम करती गार्मेन्ट कंपनियों जैसी बहुत सारी कंपनियाँ हैं जहाँ लौकडाऊन के बहुत पहले से ही उत्पादन ठप्प था, और वरकरों की काम से छुट्टी कर दी थी। वरकरों को यह कहा गया था कि उन्हें फरवरी या मार्च या कभी और वापस रखा जायेगा। यह अक्सर होता है कि काम का इन्तजार कर रहे वरकर कहीं रेड़ी लगा लेते हैं या फिर कोई दूसरी जगह कुछ वक्त के लिए काम ढ़ूँढते हैं। इसके अलावा ऐसे हजारों वरकर होते हैं जो आम तौर पर दिहाड़ी पर भिन्न प्रकार के काम करते हैं – होटल में, यातायात में, टेलरी में, कार्पेन्टरी-प्लंबिंग-इलेक्ट्रिकल में, इत्यादि।

ऐसे कई वरकर जिनका कंपनी से नाता कुछ समय से कमजोर हो चुका था, या जो कंपनियों के तेवर से झल्ला जा रहे थे, पहले पहले ही निकल लिये। बचे वे जिनका कंपनी के पास बकाया पैसा था या जो फिर भी कुछ आस लगा बैठे थे कंपनी में काम पाने की। मगर जैसे ही लौकडाऊन गहरा हुआ, ना ही उनको कंपनी की नीयत ठीक लगी, ना ही शहरों की परिस्थिति रुकने योग्य लगी। सरकार ने जो 29 मार्च को कंपनियों को दिशानिर्देश दिया था कि लौकडाऊन के दौरान वरकरों को वेतन दें, वह कुछ ही दिनों में खारिज कर दिया। ना ही कंपनियों ने उसे मान्यता दी, और ना ही सरकारों ने उसे लागू करवाने में दिलचस्पी दिखायी। इस प्रक्रिया में वरकरों को साफ दिखने लगा कि दरअसल यह कंपनियाँ अब उनके लायक नहीं हैं।

(c) खुले में टकराव और मजदूर वर्ग में बढ़ता सामूहिक एहसास

मजदूरों में घर लौटने की इच्छा के सामने सरकार ने कड़े से कड़े प्रतिबंध लगाये। इन प्रतिबंदों के जवाब में मजदूर आपस में एकजुट होने लगे। दस से पचास, पचास से सौ, सौ से पाँच सौ-हजार के दायरे में पुलिस के साथ बातें या झड़प का मामला बनता। फिर मजदूरों के समूह दस-बीस हजार के हुए, और सरकारें प्रतिबंध खोलने पर मजबूर हुईं। यह सिलसिला देश के उन सभी इलाकों में चला जहाँ मजदूर काम करने गये थे।

लौकडाऊन की तुलना कुछ बुजुर्गों ने हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बँटवारे से की है। बुजुर्गों की पार की नजर लाजवाब है, उन्हें हिंदुस्तान के भीतर का बँटवारा भी बखूबी दिखा। मगर यह हिंदू-मुसलिम के काल्पनिक झगड़े का बँटवारा नहीं है। यह व्यक्ति की पहचान से नहीं, उसकी जेब से निर्धारित बँटवारा है।

भारत में कोविड-19 बँटवारे की गाथा लौकडाऊन से नहीं, उसके पहले से शुरू होती है। भारत का पहला कोविड के 30 जनवरी को पाया गया। फरवरी में वूहान से भारतीय छात्रों को प्लेन द्वारा वापस लाया गया। साथ ही साथ विश्व के अन्य हिस्सों से भी लोगों का भारत की सीमाओं में प्रवेश मुख्यतः हवाई जहाज़ के द्वारा चल रहा था। 23 मार्च को लौकडाऊन घोषित होने के कुछ दिनों बाद तक भी विदेश से नगरिक लौटकर आ रहे थे। अंतर्राष्ट्रीय प्लेन रविवार 29 मार्च तक चलते रहे। उसके बाद भी सरकारी प्रयासों से बाहर “फंसे” लोगों को वापस लाया जा रहा था। कई शहरों में “फंसे” विद्यार्थियों और श्रद्धालुओं को बसों में घर लौटाया जा रहा था। कई शहरों के कई अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों ने पी पी ई की और मास्क की कमी बताई, और दूसरी तरफ टेस्टिंग लैब वाले कुछ ही हफ्तों में अरबपति बन गये।

किनको घर तक पहुँचाया गया, और किस पर रोक लगायी गई?

कुछ लोग अपने घरों से ताली पीटते रहे। दूसरी तरफ वरकरों ने लौकडाऊन का खुला उल्लंघन किया। इस लौकडाऊन के पाँच दिनों के बाद दिल्ली से मजदूरों के बड़े समूहों की राष्ट्रीय मार्गों पर चलने की तसवीरें आयीं। मुंबई और पुणे से मजदूरों के स्टेशनों पर जमा होते और ट्रेनों के ए सी कंपार्टमेन्ट में घुसते हुए तसवीरें और वीडियों सामने आये। इसके बाद एक-दो दिनों के अंतराल में ऐसे दृश्य आते रहे। गुजरात के सूरत में 24 मार्च से ही वरकरों ने जमा होना शुरू कर दिया था। धीरे धीरे वरकरों के समूह सूरत के अलग अलग इलाकों में जमा होने लगे। वरकर चाहे जिस किसी पेशे के हों, जिस किसी प्रांत या भाषा के हों, धर्म के हों, वापस लौटने की चाहत ने उन्हें एक दूसरे के साथ ला खड़ा किया।

– मजदूरी पर आधारित उत्पादन ने विश्व भर फैलने की प्रक्रिया में मशीनों द्वारा उत्पादन को ज्यादा से ज्यादा तेज और मजदूरों की आवश्यकता को कम से कम करने की ओर कदम उठाये हैं। इसके कारण मजदूरी बहुत घटी है, और साथ ही कुशलता की आवश्यक्ता भी कम से कम हुई है।

– इस लिए अलग अलग उद्योगों में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों का जीवन बहुत ज्यादा विभाजित नहीं है। दिन भर वेन्डर कंपनी में गाड़ी का कोई एक पुर्जा – सीट, खिड़की, वॉशर, एक्जोस्ट – बनानेवाले, या गार्मेन्ट फैक्टरी में चेन सिस्टम पर कपड़ों का कोई एक कट बनाते या सीते वरकरों में फैक्टरी के प्रति, अपनी “कला” के प्रति कोई लगाव नहीं। फैक्टरी और कारिगरी सिर्फ पैसे कमाने का एक जरिया मात्र हैं।

90% वरकर फैक्टरी से अपना जीवन जुड़ा नहीं देखते। वरकरों के इतने बड़े समूह वापस घर लौटने के उद्देश्य से इकठ्ठा हुए, ना कि फैक्टरियों पर नियंत्रण जमाने के उद्देश्य से।इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि वरकरों ने फैक्टरियों-कंपनियों को सामाजिक तौर पर निरुपयोगी घोषित कर दिया है।इससे बड़ी आलोचना वर्तमान व्यवस्था की क्या हो सकती है?

– यह अंदेशा है कि आनेवाले समय में कंपनियों का पतन और भी निश्चित है, और सरकारों के साथ नीति-निर्माताओं का ध्यान इसी पर होगा कि असंगत उत्पादन व्यवस्था को संगत कैसे बनाया जाये। ऐसे में संचालक वर्ग समझ नहीं पा रहा कि मजदूर वर्ग के साथ सख्ती से पेश आया जाये या नर्मी से, और आगे की दिशा उसे दिख नहीं रही है।

– मजदूरों का इस वक्त जो रवैया बना है, उसे देखकर लगता है कि सरकारें-कंपनियाँ उनको अपनी मर्जी के हिसाब से हाँक नहीं पायेंगी, और विरोध अधिक बढ़ेगा।

(d) अपने वजन तले धंसती कंपनियाँ

29 मई की एक रिपोर्ट यह बताती है कि लौकडाऊन के कारण लघु उद्योगों की हालत बहुत खराब है। सपलाई चेन टूटने से बिकरी नहीं हो पा रही, बना हुआ माल गोदाम में पड़ा है, पैसे नहीं आ रहे, तनखाएँ नहीं जा रहीं…. जैसा कि हर कोई ही कह रहा है, सरकारों के पास ही इस समस्या का इलाज है।ix सरकार कुछ पैकेज दे, यह बात व्यापक बेबसी को बयान करती है।

मगर यह बेबसी सिर्फ लघु उद्योगों की नहीं। बड़ी कंपनियाँ और बड़े बड़े बैंक भी इसी प्रकार के संकट से जूझ रहे हैं – सपलाई चेन में टूटन, गोदामों में माल भरा पड़ा, ग्राहकों की कमी, अधिकतर कंपनियों के गल्ले में आ रहे पैसों में गिरावट, वरकरों और स्टाफ की छटनी…… खबरें इस बात को छिपाना चाह रही हैं कि यह संकट बड़ी कंपनियों का भी है, मगर छिपाने में नाकाम।

जहाँ उत्पादन की परिस्थितियाँ नाकाम हो रही हैं, वहाँ एक मंत्री का बयान – हम देश को वैश्विक उत्पादन का केंद्र बनायेंगे, ओटोमोबील उत्पादन का केंद्र बनायेंगे। साथ ही मंत्री यह भी दावा करते हैं कि कंपनियाँ चल रही हैं।

कंपनियाँ कैसे चल रही हैं?

ब्यूमर नाम की जर्मन नेतृत्व की माणेसर में कंपनी जिसमें कन्वेयर बनाते हैं। करीब करीब 250 वरकरों द्वारा फैबरिकेशन और असेंबली का काम होता है। एक महीने पहले 21 अप्रैल को एक वरकर का संदेश – “कल से डियूटी जाने का निर्देश मिल गया। वैसे सबको नहीं बुलाया है। सिर्फ फेब्रीकेशन में बुलाया है। असेम्बली में नहीं बुलाया है। शायद डिस्पैच वालों को भी नहीं बुलाया है। यहां कुछ एयरपोर्ट से सम्बन्धित काम है उसको शायद एसेन्सीयल सर्विस डिक्लियर करके वर्क परमिट लिया है। फेब्रिकेशन में फिटिंग एवं वेल्डिंग। मशिन शॉप भी चलेगा। इसमें लेथ (खराद) का काम होता है।” फिर 22 अप्रैल की चर्चा में पता चला – कंपनी सिर्फ 50 मजदूरों को बुला रही है, जिनसे कम ही उत्पादन निकाल रही है। दो शिफ्टें, 6-6 घंटों की, बीच में 3 घंटे कंपनी की सफाई के लिए। लेकिन तनखा सारे वरकरों को, जो काम पर नहीं आ रहे उनको भी। हाँ, जो शहर छोड़ घर चले गये, उन्हें तनखा नहीं। शहर में रुकने की तनखा लेते मजदूर क्या सोच रहे हैं? 26 अप्रैल का संदेश – “कंपनी में मजदूरों के बीच इसकी चर्चा भी है कि लॉकडाउन खुलने के बाद बहुत सारी कंपनीयाँ नहीं चल पायेगी क्यों कि पर्याप्त मजदूर उपल्बध नहीं रहेगा।”

ब्यूमर कंपनी की परिस्थिति आम तौर पर ही अर्थव्यवस्था की परिस्थिति बयान कर रही है। लौकडाऊन पर ढील देने के समय से ऐसी कई कंपनियाँ हैं जिन्होंने उत्पादन चलाया, मगर बंद करना पड़ा। नोएडा में ओपो स्मार्टफोन की कंपनी मई में कुछ दिनों चली, फिर 5 वरकरों के कोवड पोजिटिव पाये जाने के बहाने पर दोबारा बंद की गई। माणेसर में ही एक कंपनी की बात है जिसने 7 मई को वरकरों को काम पर आने कहा, यह बोलकर कि अप्रैल की तनखा देंगे। तीन-चार दिन में लगभग सारे वरकरों के आने पर कंपनी ने मीडिया से फोटो शूट कराये। 20 मई तक तनखा नहीं दी। 16 मई को दो महिलाएँ कोविड पोजिटिव पायी गईं। 17 को कंपनी बंद। साधन न मिलने के कारण वरकरों को चलकर या साईकल से आने का निर्देश। वरकरों की बस की माँग। मैनेजर – “घर पर ही बैठो।” इस तरह की घटनाएँ बहुत हैं। साथ ही औद्योगिक दुर्घटनाएँ भी बढ़ रहीं हैं। कंपनी की छूटी देखरेख के कारण विशाखापटनम की एल जी पोलीमर्स में से स्टाईरेन गैस के 7 मई के दिन रिसाव से आसपास के 11 लोग मरे, और कई सारे बीमार पड़े।x जाँच में पाया कि कंपनी का पर्यावरण चेक नहीं हुआ था। 11 अप्रैल को मध्य प्रदेश के सिंग्रौली जिले में रिलायंस के एक पावर प्लांट में ऐश डैम टूटने से पास का गाँव पानी के बहाव में फस गया और दो लोगों की मौत हुई।xi अप्रैल 13 को मुंबई के बाहर बोईसर में गैलेक्सी सर्फेक्टंट नाम की फैक्टरी में ब्लास्ट हुआ। यहाँ पहले साबुन बनाने के लिए कच्चा माल मिक्स होता था, मगर ब्लास्ट वाले दिन से हैन्ड सैनिटाईजर बनाने का काम शुरू हुआ था।xii दो लोगों की मौत। वहीं 26 अप्रैल को गुड़गाँव के सेक्टर 37 स्थित मिराबेल नैचुरल्स में आग लगी जहाँ सैनिटाईजर बनाने की शुरुआत की गई थी।xiii

– इस वक्त सरकारें और कंपनियाँ इस प्रयास में लगी हैं कि व्यवस्था को किसी तरह से चलता दिखाया जाये।

– 30% से भी कम वरकरों से 10-20% उत्पादन करवाकर कंपनियाँ अपने आप को संगत बनाये रखना चाहती हैं।

– उधर इसी कारण से ऊबर, ओला, और स्विगी जैसी कंपनियाँ – जिनका गाडियों या होटलों का मालिकाना नहीं – वरकरों के अकाऊन्ट बंद कर रही हैं, ताकि जो थोड़ा बहुत धंदा मिल रहा है, उससे बाकी बचे ड्राईवर संतुष्ट रहें, और कंपनी के चलते रहने का तमाशा बना रहे।

(e) सामाजिक पुनरोत्पादन की अबूझ पहेली, और निवारण लापता

जाको राखै मजूदूर, ताको दुविधा होई

जो मजदूर फिरत नहीं आवै, ताको राखै कोई

सामाजिक दरारें और गहरी होती जा रही हैं। इसका मुख्य अवसर उत्पादन और वितरण प्रणाली का बंद होना साबित हुआ। मगर अब यह दरारें ही उत्पादन और वितरण प्रणाली को चलाये रखने में बाधा डाल रही हैं।

यह दरारें पहले भी थीं, मगर इनको छिपाने का सतत प्रयास चलता रहता था। लौकडाऊन के बाद यह गूँज उठी है कि महानगरों-उपनगरों की अधिकतर श्रमिक आबादी “प्रावासी” है – उनका शहरों में ढ़ंग का कोई ठिकाना नहीं – और उन पर निर्भर तबका उनसे कई अधिक संपन्न है। लौकडाऊन ने इस संपन्न तबके पर उतना तत्काल असर नहीं किया, मगर श्रमिक आबादी को शहरों से विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया।

याने कि दरारों को छिपाने की क्षमता खत्म हो गई। विश्व में सबसे कम के कमतर वेतन वाली जगहों पर कैसी परिस्थितियाँ उभरती हैं, यह हमें देखने को मिल रहा है। मूल दो बातें सामने आयीं हैं –

  1. कम से कमतर वेतन देने के कारण मजदूर अपने जीवन-यापन की सुविधाओं को भी कम से कमतर रखते हुए पैसे घर वापस भेजते हैं। अधिकतर मजदूरों के अपने घर-परिवार गाँवों में ही रहते हैं, तो इस लिए शहरों में उनके पास कम से कमतर व्यवस्था ही होती है।
  2. मजदूर जो सामान का उत्पादन या वितरण करते हैं, अधिकतर तो उनका उपभोग नहीं करते। अधिकांंश मजदूर दिहाड़ी पर चलते हैं, बहुत सारा जमा करने की क्षमता नहीं रखते।

एक तरफ सरकारें, पूंजी के संचालक, और पूंजी के महंगे कर्मचारी शहरों में महामारी से भयभीत लौकडाऊन कर बैठे, तो दूसरी तरफ करोड़ों मजदूरों ने लौकडाऊन को नामंजूर किया। हमारे सामने रोज देश के कोने कोने से मजदूरों की तसवीरें, वीडियों, और खबरें आती रहती हैं जिसमें मजदूर लौकडाऊन से मुक्त होते दीखते हैं।

सरकारों ने समस्या का पैमाना देख यातायात और प्रांतीय सीमाओं पर प्रतिबंध लगा दिये ताकि श्रम पर कब्जा बना रहे। फिर भी मजदूर पैरों पर चल, ट्रकों में घुस, नदियों से तैर, रेड़ी पर बैठ, और ना जाने कैसे कैसे साधनों से हाजरों मील लंबे सफर तय करते दिखे। बिहारी, बंगाली, उडिया, पूर्वांचली, बृजभाषी, झारखंडी…. जात-धर्म-भाषा-प्रांत के भेदभाव सतही साबित हो रहे हैं।

देश भर में फैले किसान-छोटे व्यवसाय में जुटे लोगों ने रस्ते पर मजदूरों की बथेरी मदद की। इस पर भी सरकार ने प्रतिबंध लगाना चाहा, क्योंकि जब भी मजदूरों और अन्य स्थानीय, कम-पूंजी वाले लोगों के बीच परस्पर सहायता के या आर्थिक संबंध बनते हैं, उसमें सरकारों और बड़ी पूंजी की जरूरत खत्म होती दीखती है। इतने बड़े तबके को अपने आप ही आपस में जीवन-यापन का पुनरोत्पादन व्यवस्था का सबसे खराब सपना बनकर सामने आया।

इस लिए ऐसी अफवाहें भी फैलायी गई कि लोग खाने में जहर मिला रहे हैं, इत्यादि। मगर पेट अफवाहों से नहीं भरता।

(f) पलायन नहीं, मजदूरों की पूर्ण सामाजिक हड़ताल

इस हड़ताल को समझने के लिए हड़ताल का जो फैक्टरी या औद्योगिक क्षेत्र का दायरा है, वह पर्याप्त नहीं है। वैसे तो ऊपर से इसे पलायन कह देना बहुत आसान है। मजदूरों के दबे-कुचले, बेबस चेहरे टी वी और सोशल मीडिया भरपूर दिखा रहे हैं। इसे कोई बँटवारे के समय के पलायन के साथ तुलना में ला रहा है। मोटे तौर पर यह बताया जा रहा है कि यह पलायन के रूप में एक तरह का विस्थापन है जो मजदूर वर्ग की विवशता पर आधारित है।

मगर इसके पीछे का रहस्य कुछ और है। तमाम खतरों, धमकियों, बेबस तसवीरों और वीडियो के बावजूद मजदूरों के समूह अभी तक घर की तरफ रवाना होने से नहीं रुके हैं। कई लोग – पढ़े-लिखे शहरी लोग – यह नहीं समझ पा रहे कि मजदूरों में ऐसा कौनसा भूत सवार हो गया है जो वे घर लौटना चाहते हैं। सरकारी और सभ्य समाज के प्रतिनिधि कहते हैं,

– “कोई भूखा नहीं है!”

– “हम सबका ध्यान रखेंगे!”

– “हम खिचड़ी तो दे रहे हैं!”

इस मुद्दे को लेकर वामपंथियों ने तमाम बातें की –

– “ये मजदूरों की रोटी की लड़ाई है,”

– “ये मजदूरों के वेतन की लड़ाई है जो कंपनी नहीं दे रही ,” (ठप्प उत्पादन के समय में!)

– “लौकडाऊन ने मजदूरों की दिहाड़ी पर लात मारी है,”

– “मकानमालिक मजदूरों को प्रताड़ित कर रहे हैं…..”

लेकिन इन बातों का सफाया हो गया। मजदूरों की बातें कैमरे पर कैद है –

– “खिचड़ी का स्वाद अच्छा नहीं लगता।”

– “यहाँ मजा नहीं आ रहा।”

– “रोक कैसे सकते हैं?”

– “अब की जायेंगे तो वापस नहीं आयेंगे।”

मजदूर जो कर रहे हैं, वे उनके लंबे समय के अनुभवों का रुख देखकर उठाये गये कदम हैं। लौकडाऊन के शुरुवात में परिस्थिति को देखकर ऐसा लगा जैसे मजदूरों की तरफ से आपातकालीन भत्ते की माँग आ सकती है। मगर भत्ते की माँग करने और उसकी पूर्ती के लिए रुकने का मूड मजदूरों का नहीं था। मजदूरों का लौकडाऊन का शत-प्रतिशत उल्लंघन यह दिखाता है कि वे सिर्फ अपने श्रम के स्वाधीन विक्रेता ही नहीं, वे चाहें तो अपने श्रम को बेचने से इन्कार भी कर सकते हैं। जहाँ कंपनियाँ और सरकारें मजदूरों को आश्वासन देते रहे कि जल्द कंपनियाँ खुलेंगी, वहाँ बात कुछ और थी – मजदूर रुकना नहीं चाहते थे, उनका मोहभंग हो चुका था।

यह पूर्ण सामाजिक हड़ताल नहीं है तो क्या है ?

लौकडाऊन खुलते हुए भी कंपनियों की एक ही मंशा है – चलते रहने का ढोंग तो करना पड़ेगा। वहाँ कुछ बचे वरकरों में अब भी लौटने की बातें चलती रहती हैं। यह एक ऐसे पैमाने की घटना है जो समय के साथ भुलाई नहीं जायेगी। इसके परिणाम आनेवाले समय की खाद बन रहे हैं। कोई भी इससे बच नहीं सकता, हर किसी को इसका अनुभव करना पड़ रहा है। यह समाज के चलने की शर्तें ही नहीं, सिद्धांत बदलने की ताकत लिये है।

*****

आगे क्या?

इस वक्त तो सब कुछ फँसा हुआ है। सरकार ने आवागमन पर रोक लगा दी है। खोलने के जो प्रयास चल रहे हैं, वे नाकाम हो रहे हैं। कहने को तो सरकार उत्पादन शुरू होने की बातें कर रही है, मगर महामारी का संक्रमण भी बढ़ता ही जा रहा है। मंदी के बारे में कोई बात नहीं चल रही। अधिकतर शहरी लोगों की या तो तनखाएँ कटी हैं, या तो नौकरियाँ छूटी हैं। संचालक वर्ग के लिए करनी और कथनी के बीच की दरार बहुत बढ़ चुकी है।

या यूँ कहें कि व्यवस्था अपने ही लंगोट में फँस गई है।

मगर कुछ सवाल बहुत उल्लेखनीय बने हुए हैं। सबसे पहला – तमाम तरह के राजनैतिक धड़े जानना चाहते हैं, मजदूर कब वापस आयेंगे? “आना तो उन्हें यहीं है,” यह किसी फिल्म के सरफिरे, हिरोईन पर फिदा किरदार की तरह हर कोई कह रहा है। मगर सरफिरा किरदार यह नहीं देखता कि उसके प्रति कोई खास मोह हिरोईन को नहीं है। इस लिए हिरोईन पर निगरानी बढ़ रही है, उसपर नियंत्रण बढ़ाया जा रहा है। मगर हिरोईन ने मन बना लिया है वह घर लौटकर आराम करेगी। तो हमारे सरफिरे तरह तरह के वादे किये जा रहे हैं।

एक और सवाल बिलकुल सीधा है – अगर वरकर इस उत्पादक व्यवस्था में दोबारा आते भी हैं, तो क्या यह पहले जैसी चलाई जा सकती है ?

तीसरा सवाल – आगे मजदूर वर्ग का संघर्ष क्या रूप लेगा?

इस सवाल पर इस वक्त कम ही कहा जा सकता है। मगर कुछ बातें गौर करने लायक हैं – 1) मजदूर इस वक्त सामाजिक हड़ताल पर हैं। कंपनियँ चल नहीं रही, तो सिर्फ नीति-निर्माण तक ही अपनी गतिविधियाँ चला रही हैं। 2) मजदूरों में क्रोध है मंडी-मुद्रा के केंद्रों के प्रति। वे दोबारा मौत के गोद में लौटने से पहले बहुत विचार करेंगे। 3) कुछ बातें ऐसी आ रही हैं कि जब कंपनी पूर्ण व्यवस्था करेगी, तब ही लौटेंगे, अन्यथा नहीं लौटेंगे। “पूर्ण व्यवस्था” का अर्थ क्या है, यह कह पाना मुश्किल है। यदाकदा उत्पादन-वितरण फिर शुरू होते हैं, तो इसका मतलब होगा वेतन पर अधिक कड़ी लड़ाई, या काम के घंटों पर खीचातानी। एक चीज़ जो बदली है वह यह है कि मजदूरों को अपनी आर्थिक परिस्थिति का सामूहिक एहसास अप्रतिम रूप से मिला है, और इससे आपस में जो हिचक होती है, वह बहुत कम हो गई है। आज के समय को देखते इसका मतलब यही निकलता है – मजदूरों द्वारा फालतू (या अतिरिक्त) काम का बढ़ता निषेध।

इस विषय पर यह भी बात चल रही है कि अगर वरकर काम पर नहीं लौटते, तो व्यवस्था तकनीक में अधिक विकास लायेगी। इसमें कोई शक नहीं कि यह किया जा सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मजदूरों की भरमार होने के कारण अब भी अधिकांश ढोने का काम मजदूरों द्वारा ही करवाया जाता है, ना कि विश्व के अन्य इलाकों की तरह फोर्क लिफ्ट या अन्य गाड़ियों द्वारा।xiv ऐसे काम में तकनीकि विकास होना संभव है, मगर समस्या इससे कई बड़ी है, और केवल इस रिक्त स्थानों की पूर्ती से व्यवस्था फिर पटरी पर आ जायेगी, यह एक ख्वाब ही है। वैसे तो पिछले दस-पंदरह सालों से सरकारें तकनीकि विकास या क्षमता की बढ़त कर ही रहे हैं – बिजली, सड़कें, रेल, बंदर, दूरसंचार, इत्यादि। मगर समस्या बहुआयामी है, सिर्फ उत्पादक क्षमता की नहीं।

मगर निकट भविष्य में तसवीर अधिक साफ है – मंदी और महामारी छाये हैं, व्यवस्था आगे बढ़ नहीं रही। नेताओं-नीति-निर्माताओं-बुद्धिजीवियों के पास विचारों की शून्यता है। सरकारें व्यवस्था को डंडे और उलझन से ही चला रहीं हैं, मगर कोई व्यवस्था डंडे और उलझन से नहीं चलती। जो तबके सरकार के करीब भी रहते हैं, उन तक भी संकट की घंटा-ध्वनि पहुँच गई है। उत्पादक शक्तियों का पुनर्गठन तो होना ही है, मगर उसको सामाजिक स्तर पर संगत बनाने कोई समाधान संचालक वर्ग के पास नहीं है। इसका एक ही मतलब है – मजदूरों और मंडी-मुद्रा के बीच की दरार बढ़ेगी, विरोध बढ़ेगा, और इसी बढ़ते विरोध से भविष्य की रूपरेखा निर्धारित होगी।

i https://www.hindustantimes.com/gurugram/in-china-s-health-crisis-gurugram-garment-makers-sense-opportunity/story-krpHLsuAxyenGxxtVQNSVN.html

ii https://www.thehindu.com/news/national/other-states/surats-diamond-industry-loses-glitter-as-slowdown-deepens/article29349510.ece

iii https://scroll.in/article/963251/i-will-never-come-back-many-indian-migrant-workers-refuse-to-return-to-cities-post- lockdown

iv https://www.hindustantimes.com/india-news/maharashtra-has-few-migrants-left-after-11-5-lakh-return-home-8-shramik-trains-cancelled/story-yUUVGpGZvvtwUny15Ox2DI.html

v https://www.hindustantimes.com/delhi-news/delhi-has-highest-share-of-inter-state-migrants/story-QCYXSWlnSYAJbNb25ljcPL.html

vi https://www.hindustantimes.com/cities/around-271k-migrants-have-left-delhi-aboard-214-special-trains-sisodia/story-kDPumJxwNB4EzRHlPMyIjP.html

vii https://www.business-standard.com/article/current-affairs/lockdown-3-0-migrant-workers-clash-again-in-surat-demand-to-be-sent-home-120050400715_1.html

viii https://www.newsclick.in/let-us-see-how-these-factories-run-without-us-jammu-migrants-refuse-return

ix https://khabar.ndtv.com/news/india/ground-report-on-msmes-in-crisis-in-bulandshahar-industrial-area-2237517

x https://hindi.thequint.com/news/india/visakhapatnam-lg-polymers-company-toxic-gas-leaked-chemical-plant-3-people-death

xi https://www.jagran.com/news/national-2-die-4-missing-as-dyke-of-power-plant-develops-breach-in-madhya-pradesh-20182273.html

xii https://mumbaimirror.indiatimes.com/mumbai/other/two-killed-one-injured-in-blast-at-hand-sanitizer-manufacturing-unit-in-tarapur/articleshow/75120548.cms

xiii https://www.hindustantimes.com/gurugram/fire-at-hand-sanitiser-production-unit-in-sec-37-no-injuries/story-nE3VKwOpbmPnn6fn8jGoUL.html

xiv https://www.wsj.com/articles/indias-food-supply-chain-frays-as-people-stay-home-11586343607

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