मजदूरों का पलायन – काम के खतरनाक चंगुल से बचते मजदूर

3,000 workers stuck at Maharashtra-Gujarat border
मुंबई से गुजरात की तरफ पैदल जाते वरकर

– दिल्ली में 3 आई एस बी टी
– गुड़गाँव में विशाल बस अड्डा
– गाजियाबाद में विशाल बस अड्डा
– नोएडा ग्रेटर नोएडा में बस अड्डे
– फरीदाबाद/बल्लभगढ़ में बस अड्डे
– सोनीपत-पानीपत में विशाल बस अड्डे
और
– दिल्ली में कम से कम सात प्रवासी रेल स्टेशन
– गुडगाँव, गाजियाबाद, फरीदाबाद में प्रवासी रेल स्टेशन
और
– दिल्ली में दो दो हवाई अड्डे
और
– बने पर बिक ना पाये ऐसे हजारों फ्लैट
– कितने सारे स्टेडियम और मैदान

फिर भी लाख से ऊपर मजदूर यहाँ महामारी के बीचोंंबीच फसे। ये सब किसके लिए चलता है फिर?

India migrant workers
पुणे रेल स्टेशन पर इंतजार करते वरकर

शहरों से बड़ी संख्या में घर लौटे/अब भी लौटते वरकर पूंजीवाद के बारे में कुछ खास बयान कर रहे हैं। हमने इसके बारे में पहले भी लिखा था, कि आज, अस्थायी नौकरी के दौर में, वरकर शहरों को महज़ कुछ समय की सोने की मुर्गी समान देखते हैं, और अपना एक पैर अपने गाँव में जमाये रखते हैं। कई वरकरों के लिए शहर में काम करने की वजह कमाकर घर भेजना होता है।

शहरों में वरकरों का सामाजिक जीवन खुल के नहीं उभरता। तो यह सवाल बनता ही है कि क्या वे एक सामाजिक वर्ग के बतौर संगठित हो सकते हैं?

Lockdown ? Thousands of Migrant workers gather at Delhi's Anand ...
दिल्ली आनंद विहार में अटकाये मजदूर

यह आम समय में ही देखा गया है कि यातायात के जो साधन वरकर इस्तेमाल में लाते हैं, वे अपनी सीमा के पार भरे होते हैं। कई वरकर 8 बाय 8 के कमरे में तीन-चार की मात्रा में रहते हैं। वरकरों की कालोनियों में बिजली-पानी नियमित नहीं होते, और कई बार हवा आने-जाने का प्रबंध भी नहीं होता। याने कि वरकर खुद पर किए खर्चे में हर तरह से कटौती करते हैं।

वरकरों के दिये इस बलिदान से कंपनियाँ वेतन कम से कम रखने में सहजता पाती हैं। क्योंकि वरकर शहरों में अपनी जरूरतों को कम से कम पैसों में पूरा करते हैं, वे जीवन का स्तर कम रखकर बचत करते हैं। इस लिए वरकरों की वास्तविक जरूरतों से कम वेतन कंपनियाँ देती हैं। जब यह प्रथा वरकरों द्वारा ओवरटाईम, ज्यादा तेजी से काम, खाने में भी लापर्वाही जैसी प्रथाओं से मिलती है, तो जाहिर सी बात है कि इसका असर वरकरों की खुशहाली पर ही पड़ता है।

वरकर अपने सामाजिक जीवन को अपने काम करने के स्थल से दूर पाते हैं। भले ही वरकरों के परिवार कंपनियों में काम करने पर ही पलते हैं, अस्थायी नौकरी के दौर में ये दो पहलू एक दूसरे से फासले पर होते हैं – काम कहीं और घर कहीं और। एक और भी कारण है जो कार्यस्थल की सामाजिकता में बाधा डालता है – क्योंकि नियमित रूप से वरकर कंपनी या अन्य काम की जगह और रहने की जगह बदलते रहते हैं, जो रिश्ते बनते हैं वे भी एक समय के बाद हवा हो जाते हैं। परिणाम में –

  • वरकर मकानमालिकों के साथ जूझने में अकेले पड़ जाते हैं।
  • कंपनी के साथ वेतन वृद्धी या काम में कटौती के लिए बात करने में भी संकोच महसूस करते हैं।

यह समस्या व्यापक है – अगर इतने सारे वरकर इन शहरों में बीमार पड़ जायें, तो यहाँ के अस्पताल एक घंटे के भीतर थप्प हो जायेंगे। कंपनियों और व्यापक समाज के लिए इतना सारा मूल्य, इतनी सुविधा बनानेवाले वरकरों के वेतन निम्न से निम्न रखे जाते हैं। उनके लिए ना रहने की, ना यातायात की, ना स्वास्थ की कोई सहूलियत इन शहरों में होती है।

जिन शहरों में वरकर नौकरी करते हैं वहाँ उन्हें सिर्फ मशीन का पुर्जा समझा जाता है। उठो, काम पे जाओ, लौटकर सो जाओ। अधिक से अधिक मूल्य बनाकर बेचना ही उत्पादन का सिद्धांत है, और इसमें किस तरह मजदूर की जैविक ऊर्जा निचोड़ी जाती है यह सबके सामने मौजूद है। इस महामारी ने ना ही सिर्फ उत्पादन पर फच्चर डाल दिया, इसने शहरों में काम कर रहे वरकरों को एक साथ दिखा दिया है कि वहाँ उनकी भूमिका सिर्फ काम करने की है।

दक्षिण एशिया में मजदूरों के वेतन विश्व में सबसे नीचे हैं। यह पलायन दिखाता है कि मजदूर इतना नहीं कमाते जिससे महामारी या काम बंद के दौरान शहरों में ही किराये पर रहें। मजदूरों को सरकारें अपने आँकलन में नहीं लेतीं, उनकी परिस्थिति के बारे में सोचे बिना यातायात बंद करने से नहीं हिचकिचाती। कंपनियाँ मजदूरों से काम ले जरूरत न पड़ने पर उन्हे मौत के हवाले छोड़ने में नहीं हिचकिचातीं। अब ऐसे में कौनसा मजदूर इस व्यवस्था को जिंदाबाद चाहेगा?

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