कोविड-19 महामारी के चलते मजदूरों की व्यवस्था से भिडंत तूल ले रही है

14 अप्रैल

बंबई-ठाणे में वरकरों का “घर लौटो” आंदोलन तूल लेता

आज सुबह के धारावाहिक के बाद शाम को बंबई के बांदरा रेलवे स्थानक के करीब वरकरों के समूह एकत्र हुए। वीडियो देखने से लगता है ये वरकर घर लौटने की उम्मीद से ही इकठ्ठा हुए, पहले पहले ऐसे नज़र आया कि टिकट की लंबी लाईनों में खड़े हैं (शायद शारीरिक दूरी बनाने की तरकीब थी)। जैसे जैसे लाईनों में अपेक्षा कर रहे वरकरों की संख्या बढ़ी, प्रशासन ने पुलिस को भेजा। बिखरे वरकरों का ध्यान एकटक पुलिस के प्रसारण की ओर हुआ। पुलिस ने सबको निवेदन किया कि उन्हें खाना मिल जायेगा, किराया नहीं देना पड़ेगा, अपनी अपनी खोली लौट जायें। वरकरों के झुंड में पुलिस के लिए कोई प्रतिनिधि नहीं, पुलिस को समझ न आये कि करीबन 2-3 हजार कुंडली मारके खड़े लोगों का क्या करे। उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, बिहार, झारखंड, ओडिसा, बंगाल, नेपाल से आये मजदूर वीडियो बनाते। वीडियो पर कई बातें कैद – “ये हम मजदूरों की हड़ताल है,” “घर जाओ आंदोलन,” “खाना दिन में एक बार मिलता है, कुत्तों के खाने लायक है,”……… पुलिस के लिए बढ़ती समस्या…… मजदूरों के बढ़ते खतरे को देख पुलिस ने लाठीचार्ज किया।

बंबई के करीब ठाणे शहर के मुंबरा इलाके में भी 2-3 सौ वरकर इकठ्ठा हुए। “घर जाने दो”। पुलिसकर्मी ने उनसे कमरों में लौटने का अनुग्रह किया, और मकानमालिकों को कहा कि किराया बाद में ले लेना।

बंबई शहर की बनावट दिलचस्प है। बांदरा, जहाँ 2-3 हजार वरकर इकठ्ठा हुए, बंबई की मनोरंजन इंडस्ट्री में काम करनेवाले जानेमाने लोगों का, कई नेताओं का, उद्योगपतियों का, साथ ही साथ मध्यमवर्ग के लोगों के रहने की जगह है। वहीं दूसरी तरफ इन संपन्न इलाकों के बीचोंबीच वरकरों की झोपडियाँ भी बड़ी संख्या में हैं, जहाँ से इन संपन्न तबकों की तमाम जरूरतों को पूरा करने के लिए लेबर निकलती है। इनमें से कितने लोग क्या काम करते होंगे यह गिनना संभव नहीं, अनुमान लगाया जा सकता है।

वहीं दूसरी तरफ ठाणे के पास पड़नेवाला मुंबरा बंबई के बाहरी हिस्सों में आता है जहाँ कुछ अधिक औद्योगिक स्थापनाएँ हैं। यह ट्रांस-ठाणे एक्स्टेन्शन कहलाया जाता है, और यहाँ केमिकल-इस्पात फेक्टरियों के अलावा एमेजोन, फ्लिपकार्ट, कूरियर सेवाओं इत्यादी के गोडाऊन, और अन्य कई प्रकार की छोटी-बड़ी फैक्टरियाँ हैं। कपडों के कई उद्योग यहाँ काफी समय से स्थित हैं।

यह उल्लेखनीय बात है कि इतने सारे वरकरों का वापस जाना छोटे धंधों और अस्थायी नौकरियों के खत्म हो जाने का संकेत है। जो वरकर घर जाने के लिए इकठ्ठा हुए, उन्हें शायद सरकार से कुछ राहत की अपेक्षा रही होगी, मगर दूसरे लौकडाऊन के पहले भी कोई राहत नहीं मिली।

सूरत

वहीं सूरत के व्राच्छा इलाके के कपड़ा मजदूर इस बार सड़क के चौराहे पर बैठ गये, इस माँग के साथ कि उन्हें घर जाने दिया जाये। करीब 5-6 सौ वरकर रस्ते पर बैठ गये, और उनकी माँग थी कि उन्हे घर जाने दिया जाये। पुलिसकर्मियों ने उनके साथ बात की और उन्हें कमरे लौटने का आग्रह किया।

अनुमान है कि सूरत में करीब 12 लाख मजदूर बाहर से आकर काम कर रहे थे। एन जी ओ और सभ्य समाज के साथ काम करते हुए प्रशासन करीब 6 लाख मजदूरों को खाना देने तक ही सफल हो पायी है। पुलिसकर्मियों का कहना है कि अब तक तो बातें चल रही हैं, मगर लौकडाऊन के अंत से पहले ही स्थिति बिगड़ने के आसार हैं। एक पुलिसकर्मी ने यह भी पूछा कि अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने वरकरों को राज्य से गुजरकर घर लौटने की अनुमति दे दी, तो गुजरात के मुख्यमंत्री ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

(सूरत के विषय में सूचना इकनोमिक टाईम्स से प्राप्त। बंबई के विषय में कई न्यूज वेबसाईटों से।)

12 अप्रैल

दिल्ली और मदुरई (तामिल नाडु) के मजदूर

दिल्ली के मध्य के करीब कश्मीरी गेट स्थित दिल्ली सरकार द्वारा चलाये जा रहे तीन पनाहगृह (शेल्टर होम) वहाँ रह रहे वरकरों ने जला दिये। फैक्टरियों के आकार में बने ये भव्य पनाहगृह सैकडों प्रवासी वरकरों को अनुशासित करने के केंद्र बने। प्रबंधकों के दुर्व्यव्हार के चलते एक वरकर ने यमुना नदी में कूदकर खुदकुशी कर ली, जिसके बाद वरकरों की प्रबंधकों के साथ भिडंत हुई और पुलिस पर पथराव हुए। इसके पश्चात वरकरों ने शेल्टर होम जलाये, और चार प्रबंधकों को यमुना नदी में कूद कर जान बचानी पड़ी।

मदुरई के यागप्पा नगर में दिहाड़ी, ठेका, और फैक्टरी मजदूर इकठ्ठा हुए। यागप्पा नगर मजदूरों के रहने का इलाका है, और साथ ही साथ सरकार ने इसे कंटेनमेंट जोन घोषित कर दिया है। 11 अप्रैल को यहाँ के मजदूर बहर निकल बैरिकेडों पर इकठ्ठा हो गये, कहते हुए कि अब उनसे अंदर और रहा नहीं जायेगा। पुलिस तैनात रही, वरकरों से वापस लौटने की अपील करती रही।

11 अप्रैल, 2020

सूरत के मजदूर

वरकरों के गुस्से की महज़ दूसरी सीटी – दाल आगे और पकेगी

लौकडाऊन घोषित होने के महज दूसरे दिन ही – 24 मार्च – सूरत के वाड़ोद इलाके में वरकरों के जत्थों की पुलिस से झड़प हुई थी, जिसमें एक हजार – 1,000 – से ज्यादा वरकर शामिल होने की खबर आयी थी। कल रात, 10 अप्रैल, सूरत के लक्साणा इलाके में दोबारा वरकरों के समूहों ने रस्ते ब्लौक कर गाड़ियों को तोड़ा-जलाया और पुलिस के आने पर पथराव भी किया। मीडिया में अफरातफरी। टी वी पर झूठ पर झूठ बोलनेवाले पत्रकारों से कल रात से लेकर अब तक इस हाल को देख सच रुक नहीं रहा – वरकर बग़ावत कर रहे हैं। अगली ही सुबह सरकार ने आर ए एफ तैनात की, पुलिस ने करीब 60-70 लोगों को गिरफ्त में लिया।

मीडिया पर आ रही बातें इस सच को किसी तरह छिपाने का प्रयास कर रहीं हैं, मगर नाकाम – वरकरों की माँगें पूरी नहीं हो रही, तो वरकर विरोध कर रहे हैं, मगर विरोध करने का तरीका देखिये! पथराव, आग लगाना, सामाजिक दूरी की धज्जियाँ उड़ गई! लौकडाऊन तोड़ रहे हैं! वरकरों पर आरोप लगा रहे हैं कि वे महामारी की तीव्रता नहीं समझ रहे, उनको कमरों में रहकर एन जी ओ और सभ्य समाज द्वारा दिया गया खाना खाकर शांत रहना चाहिये। इन आरोपों में कोई दम नहीं। वरकर शारीरिक दूरी के न हो पाने पर सामूहिक कदम की मिसाल पेश कर रहे हैं।

वरकर कह रहे हैं – शारीरिक दूरी तो वैसे भी चूल्हे में गई। पास पास सटे कमरों में रहते हैं, साझे पाखाने-नलके इस्तमाल करते हैं, खाने के लिए लंबी लाईनों में लगते हैं। अब ये कौन लोग हैं जो इऩ्हें सामाजिक दूरी का पाठ पढ़ा रहा है? खाना देनेवालों की नीयत ठीक है, मगर खाना बेस्वाद। कंपनियों का मालिक बकाया वेतन और काम बंद होने के समय का वेतन देने से इनकार कर रहा है। पुलिस ने लोगों का आना जाना बंद कर रखा है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिसा से आये लाखों मजदूर सूरत के कपड़ा, हीरा, और निर्माण के व्यवसाय में काम करते हैं।

मजदूरों के कदम यह बताते हैं कि सामाजिक दूरी और लौकडाऊन की जो योजना सरकारों ने बनायी है, वह मजदूर तबके के लिए फेल है। हर कोई यह कह रहा है कि बीमारी से लोग न मरें इस लिए सरकारों और संपन्न तबके ने उन्हें भुकमरी और बदहाली के हवाले छोड़ दिया है। सरकारों ने लोगों के आवागमन पर ही प्रतिबंद लगा दिया है। दरअसल इसके पीछे एक और बात छिपी है जिसे कहने से मीडिया और विशेषज्ञ डर रहे हैं।

हीरे का व्यापार बहुत अधिक समय से घाटे की तरफ चल रहा है। यह कोई नई बात नहीं है। वैश्विक मंदी के समय में हीरे-जवाहरात की माँग कम होना सामान्य है। डायमंड इन्डस्ट्री और उसमें लगे वरकर यह बहुत समय से अनुभव कर रहे हैं। वेतन में वृद्धि न होना, बोनस न मिलना, या कम मिलना – ये पिछले कुछ साल के अनुभव रहे हैं। डायमंड इन्डस्ट्री की ढलान कुछ सालों से तो चल रही है। साथ ही साथ – वैश्विक मंदी के चलते रैडी मेड गार्मेंट्स की माँग में भी कमी हुई है। इससे कपड़े और सूत की माँग भी घटी है। कंपनियों को वरकरों को वेतन देना वैसे ही मुश्किल पड़ रहा है, ऐसे में सरकारों के कंपनी चालकों को “लौकडाऊन के वक्त पैसे दो” वाले आहवान की धज्जिया उड़ जाने में कोई अचरज की बात नहीं। यही हाल निर्माण के व्यवसाय का भी है, जो कम से कम पिछले 6-7 साल से भारी मंदी से गुजर रहा है। कंपनियाँ चल नहीं पा रहीं। लोन की किश्तें चुका नहीं पा रहीं। बैंक दिवालिया होते जा रहे हैं।

ऐसे में कोरोनावायरस की महामारी सरकारों और कंपनियों के लिए एक बढ़िया बहाना बन गई है अपने सामाजिक पतन को ढकने के लिए।

  • वरकरों को एक दूसरे से मिलने, इकठ्ठा होने से रोको।
  • वरकरों में भय का माहौल पैदा करो।
  • वरकरों को घर बैठाओ और फैक्टरियों से दूर रखो।
  • कंपनियों-संस्थाओं द्वारा जिम्मेदारियाँ पूरी न कर पाने पर उनका बचाव।

विश्व भर में मंदी फैलने के समय में कोरोनावायरस को बहाना बनाकर सरकारों की मनमानी हरकतें वरकरों को समझ आ रही हैं। एक तरफ सरकारें-कंपनियाँ-विशेषज्ञ-संपन्न लोग आम समाज की सामाजिकता नकार रहे हैं, दूसरी तरफ वरकर यह दिखा रहे हैं कि मनुष्य सामाजिक जीव है। घर बैठे-बैठे महामारी से नहीं लड़ा जा सकता, इसके लिए पर्याप्त परिस्थितियाँ बनाने की आवश्यकता है। मजदूर अनुकुल परिस्थितियों की तरफ बढ़ने के बड़े कदम उठा रहे हैं।

1 अप्रैल, 2020

उत्तर प्रदेश में लगभग 19,000 एम्बुलेंस कर्मचारी जो कि 4,700 एम्बुलेंस चलाते हैं, हड़ताल पर चले गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन्हें पिछले 2 महीनों से वेतन नहीं दिया गया है और साथ ही साथ ना ही काम करते समय सुरक्षात्मक गियर। उन्होंने दो दिन तक हड़ताल की। यूपी सरकार के अधिकारियों ने एसोसिएशन के प्रमुख के साथ बात की और उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें जल्द ही उनकी बकाया राशि के साथ-साथ सुरक्षात्मक गियर भी दिए जाएंगे। एम्बुलेंस सेवाओं को फिर से शुरू किया गया है। अधिकारी ने यह भी कहा कि इस तरह की आपातकालीन स्थितियों में हड़ताल करना अवैध है।

दरभंगा में दिल्ली से लौटते मजदूर पुलिस की गुंडागर्दी पर प्रहार करते (30 मार्च)

देश के अन्य जगहों से भी खबरें आ रही हैं । नीचे दी गई खबर गुजरात के सूरत से –

“पुलिस ने कहा कि 1,000 से अधिक प्रवासी मजदूर पांडेसरा पुलिस स्टेशन के पास वनोड में सड़क पर एकत्र हुए थे और मुख्यतः यूपी, बिहार, बंगाल में अपने मूल निवास लौटने के लिए शहर छोड़ने की अनुमति मांग रहे थे। जब पुलिस ने उन्हें शांत करने की कोशिश की, कुछ मजदूरों ने पुलिस पार्टी पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। पुलिस ने भी लाठी, हवाई फायरिंग, और आंसू गैस से जवाबी कार्रवाई की, और मुठभेड के बाद 96 एफ आई आर दर्ज किये। पांडेसरा और पड़ोसी सचिन इलाके सूरत में शहर के अधिकांश प्रवासी मजदूरों के आवास के लिए जाने जाते हैं जो ज्यादातर कपड़ा उद्योग में काम करते हैं। हालांकि पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि वरकरों को किरये का भुगतान नहीं करना होगा और उनके भोजन का ध्यान रखा जाएगा, बड़ी संख्या में लोग पहले ही छोड़ चुके है, और अन्य लोग जाने की कोशिश कर रहे हैं।”

नीचे दी विडियो कोटा, राजस्थान के पास की है जहाँ के रहवासियों ने चलती ट्रक में से आटा लूटा। ट्रक चालक ने बयान दिया, “इसमें कुछ गलत नहीं। जैसा माहौल है, यह होना तो स्वाभाविक है। सरकार को देखना चाहिए कि किसी तरह की कमी न आये।”

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