सत्ता का चरित्र – महामारी से अहम मुनाफ़ाखोरी

(गुड़गाँव में सक्रिय एक साथी द्वारा लिखा लेख।)

वर्तमान और निकट भविष्य में कंपनियाँ और कंपनियों पर आधारित व्यवस्था संकट में हैं। कंपनियों का मुनाफा नहीं बन पा रहा या जरूरत से कम बन रहा है। सरकारें और संचालक वर्ग कोशिश करेंगे कि ऐसे तरीके ढूँढ निकालें, या श्रम को इस तरह नियोजित करें कि दोबारा पर्याप्त मुनाफा बने। सरकारों और संचालकों का काम है मुनाफा बरकरार रखते हुये वर्तमान को बचाने का। हम इसे कोविड -19 जैसी वैश्विक महामारी के सन्दर्भ में भी देख सकते हैं, जो कि कोरोना परिवार के एक वायरस की देन है। सबको पता चल गया है कि यह इस तरह का वायरस है जो संक्रमित मरीज के इलाज के दौरान स्वास्थ कर्मी को भी चपेट में ले लेता है।

रिपोर्ट है कि चीन के वुहान में वायरस की पहली चेतावनी देने वाले ३४ वर्षीय डॉक्टर ली वेनलियांग की मौत वायरस के ही सक्रमण से 7 फरवरी को हो गई। वायरस की चेतावनी साझा करने पर उन्हें चीनी प्रशासन का अभद्र व्यवहार झेलना पड़ा था। कहा जा रहा है कि चीनी सरकार अब जाकर उनके परिवार वालों से सरकारी अभद्रता के लिये माफी मांग रही है। सभी सरकारों का नशे मे रहना स्वभाविक बात है। उसको इस तरह की बातें फैलने देना पसंद नहीं जिनसे वर्तमान को चोट पहुंचे। सरकारें होती ही ऐसी है। सरकारों का मूल मकसद कंपनियों द्वारा पूंजी बढ़ाने की दिशा में नीति-निर्धारिण करना होता है। पूंजी-निवेशकों, निर्यातकों, आयतकों के लिए रास्ते सूलभ करना। पूंजी बढ़ाने के मार्ग में आने वाले रोड़े हटाना। इसके बावजूद पूंजी नहीं बढ़ती! फिर सरकार का क्या मतलब रह जाता है? इस लिए सरकार असंभव को संभव बनाने – मुनाफाखोरी को बचाने – के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

इधर भारत में 31 जनवरी को पहला COVID-19 मामला दर्ज किया गया। सरकार के विदेश व्यापार महानिदेशालय ने एक अधिसूचना जारी कर व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) के निर्यात पर रोक लगा दी। इसके पश्चात सरकार को कंपनियों द्वारा मुनाफा कमाने के लिए प्रेशर आया और 8 फरवरी को पिछले आदेश में संशोधन करते हुये सर्जिकल मास्क और सभी दस्तानो के निर्यात की अनुमति दी गई।

निर्यातकों को महसूश हुआ कि अभी मुनाफा कमाने और पूंजी बढ़ाने का अवसर है। निर्यातकों के मार्ग को और सुलभ बनाने के लिये सरकार आगे आई और 25 फरवरी को प्रतिबंधों पर और ढील देते हुये निर्यातकों को आठ नई वस्तुओं के निर्यात की अनुमति मिल गई। ना तो निर्यातकों ने और ना ही सरकार ने इस पर विचार करना आवश्यक समझा कि भारत के स्वास्थ कर्मियों की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा या नहीं। वैसे भी सामान्यत: सरकार अथवा निर्यातकों को इससे क्या लेना देना!

इधर जो खबरें आ रही है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार एवं निर्यातकों के इस व्यवहार की कीमत सामान्य जनों को तो चुकानी पड़ेगी ही, भारत के स्वास्थ कर्मियों को भी इसकी कीमत चुकाने के लिये तैयार रहना होगा।
इसकी तैयारी शुरू भी हो गई है। आम जनों से ताली और थाली पिटवाना इसी मकसद के लिये था कि वे सरकार पर उंगली ना उठा सकें और अपने ही आप में मस्त रहें।

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