होंडा मजदूरों का डेरा – कुछ बातचीत

10.11.19

तीन-पाँच-दस-बारह साल से काम कर रहे होन्डा माणेसर प्लांट के वरकरों को कंपनी ने कुछ महीनों से 5-10 की संख्या में निकालना शुरू किया। दीपावली के दौरान कंपनी के अस्थायी वरकरों ने सामूहिक भूक हड़ताल चार दिनों तक की। “हमने चार दिनों तक बिना कुछ खाये उत्पादन दिया।” कंपनी को वरकरों के संकेतों से समझ आ गया कि वरकरों में सामूहिक भावना उभर रही है। यूनियन वाले अस्थायी वरकरों से बोले – “कुछ खा लो।” चार दिन तक वरकरों की भूक हड़ताल चली। उसके बाद वरकर दीपावली और छठ के लिए घर जाकर लौटे। लौटने पर वरकरों को निकालने की तीव्रता कंपनी ने बढ़ायी। यहाँ 4-5 नवंबर को कंपनी ने झटके में 50 को बाहर किया। निकाले वरकरों की संख्या करीब 500 की है। तब से वरकरों ने लाईनें बंद कर कंपनी के अंदर और बाहर डेरा जमाया है।

होन्डा (माणेसर) में जनरल शिफ्ट छोड़ ए-बी-सी तीन शिफ्टें होती थीं। “जनरल शिफ्ट मैनेजरों-सुपरवाईजरों-लाईन-इनचार्जों की होती है, ए और बी शिफ्ट में असेंबली होती, और सी शिफ्ट में एन्जिन तैयार किये जाते। कुल मिलाकर 2500 टेम्पररी और उतने ही पर्मानेन्ट वरकर फैक्टरी में थे। जब प्रोडक्शन तेजी पर था, एक मिनट में एक लाईन पर तीन टू व्हीलर तैयार होते थे। लाईन 1 पर 1200, लाईन 2 पर 2100, और लाईन 3 पर 700 का टार्गेट होता था दिन का। कुछ महीनों से लाईन 2 पर 600 का टार्गेट हो गया है। बाकी लाईनों पर भी प्रोडक्शन घटा है। पहले सी-शिफ्ट बंद की। मैं पहले ए शिफ्ट में हुआ करता था। एक दिन काम पर पहुँचा तो मुझे बोला बी शिफ्ट में आओ। जब बी शिफ्ट पर पहुँचा तो बोला कि काम नहीं, तीन महीने बाद आना।”

कंपनी सुकमा, कमल, और के सी नाम के तीन ठेकेदारों द्वारा वरकरों को रखती है। 11 महीनों के बाद ब्रेक कर दोबारा लेती है। “मेरा फरवरी (2020) में ब्रेक होना था। कुछ लड़कों का मार्च में होना था। ये भाई दिसंबर (2019) में ब्रेक किये जाने वाले थे। हमें अभी ही निकाल दिया। आई टी आई और कुशल योजना के तहत ऐपरेन्टिस भी रखे हैं, कम वेतन पर काम करते हैं। कौन्ट्रैक्ट और कैसुअल वालों को कट पिट कर 14,000 कुछ रुपये देते थे। ट्रेनी और ऐपरेन्टिस को कम पर काम कराते थे। वेन्डरों द्वारा भी भर्ती करनी शुरू की थी। कईयों को बिना बकाया वेतन के निकाला….”

एरिया के नेता वरकरों से – “आपकी माँग काम पर वापस लेने की ही नहीं, स्थायी नौकरी की भी है! मैनेजमेन्ट को काम पर रखने के लिए झुकाना है।” वरकरों के सवाल यह बात नहीं दर्शाते। वरकरों के क्या सवाल हैं?

  • पाँच-दस साल के ऊपर से ही यहाँ काम कर रहे हैं। कहाँ जायेंगे ? कमरे का किराया कौन देगा ? बच्चों की पढ़ाई ? दस साल बाद कोई नौकरी पर भी रखेगा ?
  • ब्रेक सिस्टम के आड़ में कंपनी फैक्टरी ऐक्ट से बचना चाहती है। हम लगातार इसी फैक्टरी में काम किये हैं। हमारा ग्रैचुटी, नोटिस… तमाम तरह का इतने सालों के हिसाब से बनता है।
  • कंपनी के अधिकारी- “प्रतिनिधि भेज कर बात करों।” वरकर- “कंपनी के प्रतिनिधि आकर वरकरों से बात करें।”
  • वरकरों को उक्साने की कोशिशे के बावजूद वरकर सय्यम से कदम उठा रहे हैं। “हमने टपूकरा की 2016 की घटनाएँ देखी हैं, हम झाँसे में नहीं आनेवाले। हम डटे रहेंगे, उक्साये नहीं जायेंगे। हमारा संघर्ष जायज़ है।”

होन्डा के वरकरों ने यह बात सही समझी है कि यहाँ ना तो आर-पार की लड़ाई है, ना ही यह समय में पीछे जानेवाली – पर्मानेन्ट नौकरी मिलने वाले – लड़ाई है।

होन्डा वरकरों की हलचल का कुछ असर अन्य फैक्टरियों के वरकरों पर भी पड़ा है। पास में स्टैनली मोल्डिंग कंपनी है, जिसके दो वरकर होन्डा गेट पर क्या चल रहा है, देखने के लिए आये थे। “दो शिफ्ट में 1200 वरकर, 10,500 तनखा। अधिकतर ओपरेटर। होन्डा के लिए एन्जिन पार्ट मोल्डिंग मशीनों पर बनाते थे। तीन रोज़ पहले कंपनी बंद हो गई।

2016 में होन्डा टपूकरा से निकाले वरकर कई समय से माणेसर में अन्य फैक्टरियों में काम कर रहे हैं। वे भी अपना अनुभव बाँटने और साथियों की हौसलाफज़ाई करने के लिए मौजूद थे। “संडे का दिन है, हमने सोचा देखे इस बार वरकर भाई क्या कर रहे हैं।”

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