निजी संपत्ति का स्वर्गवास

वर्तमान दृश्य

निजी संपत्ती का जनाज़ा वैश्विक स्तर पर सबके सामने निकला जा रहा है। निजी संपत्ति की मौत का आना काफी समय पहले से देखा गया है। ऐसा कहना ठीक होगा कि 20वी सदी के आरंभ से – दोनों विश्व युद्धों के दौर से – निजी संपत्ति खतरे में रही है। यह उस वक्त की बात है जब विश्व के कई भागों में निजी संपत्ति का मूल स्वरूप कृषकों या छोटे उद्योगों वाला था। मगर दूसरी तरफ यूरोपीय महाद्वीप और उत्तरी अमरीका तक फैली फैक्टरी उद्योग की पद्धति ने पूरे विश्व को माँग-आपूर्ति के जाल में बसा लिया था, जिसके साथ छोटे उत्पादक स्पर्धा नहीं कर सकते थे। इसने विश्व भर में हलचल मचा दी थी, और वैश्विक संतुलन काफी डावाडोल होता गया। उस समय से सरकारों, चिंतकों, तथा नीति-निर्माताओं की कोशिश यही रही है कि किसी तरह निजी संपत्ति को बनाये रख सामाजिक स्थिरता कायम रखें। जहाँ पूंजी पर आधारित उत्पादन अधिकांश लोगों को अपने जीवन-यापन के पारंपारिक तरीकों से विस्थापित करता जा रहा था, “स्थिरता के लिए मध्य-वर्ग जरूरी है,” यह पूंजीवादी व्यवस्था संचालकों का नारा बन गया।

थोड़ा सा इतिहास

1945 से लेकर अब तक के दौर में विश्व भर में पूंजी की भूमिका “सामाजिक कल्याण” के क्षेत्र में काफी बढ़ी। “सामाजिक कल्याण” का मूल उद्देश्य एक तरफ विस्थापित होते सामाजिक तबकों को दिलासा देने का रहा। और दूसरी तरफ उत्पादन और संचय के केंद्र में लगे मजदूरों में पिछली सदी से बढ़ते असंतोष का हल निकालने का रहा जो दोनो विश्व यु्द्धों के समय में चरमसीमा पर था। पूंजी को बचाने के लिए कई प्रयास हुए।

एक तरफ यदि कृषक या छोटे व्यवसाय वाले तबकों को देखें, कई तरह की सरकारों ने – उदारवादी, साम्यवादी, समाजवादी, इत्यादि – भूमि सुधारों के तहत भूमिहीन कृषी मजदूरों को भूमि दिलवाने का संकल्प रखा, जिसका जमींदार तबकों ने भारी विरोध भी किया। यह विवाद पूंजी का आंतरिक विवाद ही रहा – जमीन के व्यक्तिगत मालिकाने किसके होंगे? जहाँ कृषी-मजदूरों और छोटे किसानों ने जमीन पर कब्जा बनाने का संकल्प उठाया, वह या तो पूंजी की संगठित ताकतों द्वारा कुचला गया, या तो सफल होने पर विशाल नौकरशाही-सैन्य तंत्र में तबदील हुआ। ऐसे सरकारी तंत्र उत्पादकों द्वारा बनायी वस्तुओं का हकदार बन गये, और स्वयं पूंजिपति की भूमिका निभाने लगे। इस जद्दोजहद से पार पाने के लिए पूंजी के प्रतिनिधियों ने तरह तरह की “कल्याणकारी” स्कीमें अपनाईं – रोजगार के लिए, पढ़ाई लिखाई के लिए, स्वास्थ्य-संक्रमण के लिए। पागलपन यहाँ तक पहुँच गया कि सरकारों ने बच्चे पैदा करने पर भी रोक लगानी चाही। सरकारों ने सामान के आवागमन पर कड़ी निगराहनी भी लगायी, और घरेलू मंडी को बचाने के लिए रोक-थोक, या घरेलू उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए स्कीमें, ऐसे तमाम हथकंडे अपनाये। ये तरकीबें सामाजिक प्रक्रिया रोकने में असफल रहीं। अंतर-सरकारी नियंत्रण के इन संकल्पों का टूटना बहुत समय से देखा गया है, और जगह जगह पहचानों या गुटों के बीच सशस्त्र झगड़ों का आधार बना है। निजी संपत्ति की कब्र पर हो रहे ऐसे झगड़े आज बढ़ती तेजी से पनप रहे हैं।

दूसरी तरफ औद्योगिक और सेवा मजदूरों के लिए कानूनी ढाँचा, मैनेजमेन्टों-वरकरों के बीच सरकार की मध्यस्तता, यूनियनों का फेर-जाल, ऐसे तमाम प्रावधान सामाजिक स्तर पर गठित हुए जो मजदूरों के असंतोष भरे कदमों को रोकने के लिए बने थे। इसके बावजूद विश्व भर में 1950-80 तक का दौर पूंजी के लिए संकट का ही रहा, और तमाम कोशिशों के बावजूद वह उत्पादक ढ़ाँचा चल न पाया। सरकारों ने विश्व भर सैन्य दमन बढ़ाया, तो कंपनियों ने तनखाएँ भी बढ़ाईं, अधिकार लिये-दिये, जनतंत्र-हुकूमशाही के खेल खेले, मगर मजदूर वर्ग में असंतोष यहाँ तक पहुँचा कि संचालकों को पूरा उत्पादक ढ़ाँचा बदलना पड़ा। 1980 के बाद उत्पादन की तकनीकों में इलेक्ट्रोनिक्स और कंप्यूटरों का आगमन, खेती का बढ़ता तकनीकीकरण और स्तर, वैश्विक उत्पादन का यूरोप से चीन-वियतनाम-भारत जैसे देशों में घर करना। पर्मानेन्ट, कानून द्वारा मान्य वरकरों के दौर खत्म, अस्थायी वरकरों का नया दौर शुरू।

आज हम कहाँ है?

सामाजिक वैश्विकरण के साथ साथ पूंजी की उत्पादकता बहुत अधिक बढ़ी है। रोजगार संकट में है, औपचारिक नौकरियों में लगे लोगों की संख्या सिकुड़ रही है। इस अस्थिरता में एक दूसरे से दूर दो छोरों पर एक सा नज़ारा – एक तरफ भारत-पाकिस्तान में कर्ज तले आत्महत्या करते किसान, तो दूसरी तरफ यूरोप-अमरीका (और भारत के ही “विकसित” तबकों) में अधिकाधिक निजी लोन पर गुजारा करते लोगों का लोन की किश्त लौटा ना पाना। यहाँ भारत में इस बदहाली से बनते असंतोष पर काबू रखने के लिए 2017-18 में केंद्रीय व राज्य सरकारों ने सिर्फ 7 राज्यों के किसानों के ही 2.7 लाख करोड़ रुपये के कर्ज के पैसे चुकाये। तो 2008 में धडल्ले से ग्राहकों को कर्ज देने वाले बैंकों के दिवालिया होने पर अमरीकी सरकार ने 1.5 लाख हजार डालर का बचाव पैकेज दिया। जिन ग्राहकों ने कर्ज लिए थे, वे सब कुछ डुबा गये। कंपनियों के उच्च स्तर के अधिकारी-अफसर उसमें से अपने हिस्से निकाल ले गये। यही मंजर आज भारत में भी जोर-शोर से दिख रहा है…..

निजी संपत्ति बनाम मजदूरी

यह साफ है कि निजी संपत्ति अब अहम नहीं रही, असंगत हो चुकी है। साथ ही साथ, इसे संगत बनाये रखने के सरकारों के कदम अंधेरे जंगल में पहुँच गये हैं जहाँ तरह तरह की नई समस्याएँ पनप रही हैं। निजी संपत्ति का आज अर्थ केवल बचत तक सीमित है। कहावतें उल्टी पड़ रही हैं – सौ लोहार की, एक सुनार की। मध्यम-वर्गीय स्थिरता खतरे में लगती है, और जो तबके मध्य में स्थिरता-पसंद रहे हैं, उनको यह साफ होता जा रहा है कि या तो ऊपर जाना होगा, या तो नीचे आना। इस संदर्भ में आई एल ओ की एक रिपोर्ट में पाये गये कुछ नतीजे उल्लेखनीय हैं – जहाँ पूंजी परजीवि बन तमाम छोटी पूंजी, जमा राशी, इत्यादि निगलती जा रही है, वहाँ आई एल ओ की रिपोर्ट में पाया गया है कि दक्षिण एशिया में पिछले दस सालों में मजदूरों के वेतन बहुत तेजी से बढ़े हैं। 2006-2015 के बीच चीन के वरकरों के वेतन तीन गुना बढ़े। पूंजी को आज निजी संपत्ति से नहीं, वेतन से चुनौती है। बेताल को विक्रम पर अग्रसर रहना मुश्किल पड़ता जा रहा है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s