वर्तमान चित्र भाग 1 – हम कहाँ रहते हैं ? वहाँ क्या हो रहा है ?

[हमारे आस पास जो कुछ चल रहा है, क्या इसे समझने की इच्छा है ? हम कौन हैं, कहाँ हैं, क्या कर रहे हैंं, हमारा जीवन कैसा है, कैसा बन सकता है, कैसा बनाना चाहते हैं, ऐसे बहुत से सवालों और जवाबों की खोज में हम हैं। यह लेख एक ऐसे सिलसिले में पहला है जिसमें ऐसे ही कुछ सवालों और जवाबों पर चर्चा पेश है।]

दक्षिण एशिया में जीवन बाकी विश्व से तेजी से गुंथा जा रहा है

पिछले तीस सालों में वैश्विक लेन-देन में दक्षिण एशिया के देशों की भूमिका कुछ तेज़ी से बदली है। यहाँ चलता उत्पादन हरारत से बढ़ रहा है, और इससे आम जन-जीवन पर भी गहरा असर पड़ा है। इस प्रक्रिया को देश के नेता और बुद्धिजीवियों ने “विकास” का नाम दिया है , और वे सब एक सुर में यह कहते हैं कि विकास अच्छा है , इससे भी अधिक विकास की जरूरत है।

“विकास” किस चिड़िया का नाम है ?

इस विकास के दो महत्वपूर्ण पहलू हमने देखे हैं – पहला, काम के बढ़ते घंटे, और दूसरा, काम की बढ़ती अनिश्चितता। जो लोग नौकरी करते हैं , उन्होंने इन दो विपरीत परिस्थितियों को एक के बाद एक महसूस किया होगा – या तो काम बहुत तेज़ी से चलता है, ओवरटाईम-जबरण ओवरटाईम के साथ, जिसमें सुपरवाईजर उत्पादन की गति बढ़ाने की कोशिशें करते रहते हैं……. या तो काम मिलता ही नहीं, या कम समय के लिए मिलता है, दिन-दिन भटकने के बाद भी।एक तरफ जहाँ वरकर दिन के 10-14 घंटे काम में लगा रहे हैं, वहाँ

  • “और विकास!” का नारा क्या मायने रखता है?
  • बढ़ते विकास के साथ काम के बढ़ते घंटों का क्या मतलब है?
  • अत्याधुनिक उत्पादन करने की तकनीकों के दौर में बढ़ते काम के घंटों का क्या अर्थ है?
  • और फिर इस पूरी प्रक्रिया का धीमा हो जाने का क्या अर्थ है , जिसे मंडी की भाषा में “मंदी” कहा जा रहा है?

बढ़ रही है उत्पादकता

दरअसल काम के घंटे बढ़ने का मुख्य कारण काम का सामान्यतः अधिकाधिक अनिश्चित बनना ही हैं। किसी ज़माने में फैक्टरियों-दफ्तरों में स्थायी वरकर रखे जाते थे। मगर पिछले तीस वर्षों के बदलावों तहत 1) पढ़े-लिखे-कुशल व्यक्तियों की संख्या बढ़ी है, 2) मशीनों पर शोध से और ऊर्जा को पृथवी से बेलगाम निचोड़ने से तकनीकी कुशलता और उत्पादकता बहुत बढ़ी है।इन कारणों से आज का वरकर पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा उत्पादन दे रहा है। हमें ठेकेदारों द्वारा दिहाड़ी, पीस-रेट, कॉन्ट्राक्ट पर इसी लिए रखा जा रहा है ताकि हमसे बस जरूरत भर का श्रम निचोड़ा जा सके। तो इससे काम की अनिश्चितता कैसे बढ़ी? आज हम अत्याधुनिक मशीनों पर उत्पादन करते हैं जिन्होंने मानवीय श्रम की उत्पादकता को बहुत बढ़ाया है।

  • सिलाई मशीनें बिजली पर चलती हैं – इनसानी दमखम की जरूरत नहीं, टेलर सिर्फ सिलाई पर ध्यान देता है।
  • इससे भी आधुनिक कपड़ों के मोल्ड कुछ फैक्टरियों में चल रहे हैं, जो टेलर की कारीगरी पुरातन कर देते हैं।
  • एम्ब्रॉयडरी करने की कंप्यूटराईज़ मशीनें आ गई हैं – हाथ की कला का दिवाला।
  • बड़ी मशीनों, वाहनों, आदि में पेंच कसने वाले, कटाई-फिटिंग , लीपा-पोती-रंगाई करने वाले रोबो और स्वसंचालित सिस्टम बन चुके हैं – इनसानों की भूमिका लगभग देखरेख तक सीमित हो जाने की है, उत्पादन करने की नहीं।

यदि पहले एक वरकर औजारों द्वारा पेंच कसता था, वेल्डिंग करता था, या टाँका लगाता था तो उसे उत्पादन कहते थे। प्रक्रिया की देखरेख करता सुपरवाईजर उत्पादन नहीं करता था, उत्पादन की देखरेख करता था, हालाँकि मोटे तौर पर यह भी उत्पादन की जरूरत का हिस्सा है। आज तकनीकों की बढ़त ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या स्वसंचालित प्रक्रियाएँ जिनमें उत्पादन की क्रियाएँ बढ़ती तादात में मशीनें करती हैं मजदूरी पर आधारित उत्पादन हैं या कुछ नया ? आज का दौर केवल किसानों और छोटे व्यवसायों के विस्थापन का नहीं, साथ ही साथ आवश्यक श्रम से मजदूरों के विस्थापन का सवाल भी खड़ा करता है , और उनके साथ साथ इन्सानी उत्पदाकों को संचालित करते मैनेजरों-सुपरवाईजरों-फोरमैनों के विस्थापन का भी सवाल खड़ा करता है। इसका नतीजा यह कि एक तो मानव समुदाय में फालतू – या बेरोज़गार – आबादी बढ़ रही है , और दूसरा यह कि कार्यशील आबादी का एक बड़ा हिस्सा निजी जीवन यापन के लिए अनावश्यक श्रम में लगा है। पहले खेती में मशीनों-रसायनों ने खेत मजदूरों का विस्थापन किया। आज की परिस्थिति यह है कि किसानों की आपसी होड़ छोटे किसानों और छोटे धंधों को विस्थापित कर रही है , दिवालियेपन की तरफ ढकेल रही है। अधिकाधिक आबादी शहरों की तरफ नौकरियाँ ढूँढने बढ़ रही है।

तो फिर काम के घंटे क्यों बढ़ रहे हैं ?

केवल तर्क के लिए मान लेते हैं – क्या रोज़गार पूरा करने के लिए एक व्यक्ति को 12 घंटे काम देने के बजाये 2 व्यक्तियों को 6-6 घंटे लगाया नहीं जा सकता ? किया तो जा सकता है, मगर नौकरी देनेवाला कहता है कि इसमें मुनाफा नहीं। एक व्यक्ति 12 घंटों में उतना ही काम करता/करती है जितना 2 व्यक्ति 6-6 घंटों में करते हैं। मगर 1 व्यक्ति को काम पर रखना 2 के मुकाबले सस्ता है। 1 काे वेतन देना 2 से सस्ता होता है, साथ ही साथ 1 मशीन रखना 2 मशीन रखने से सस्ता पड़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि मूल सवाल सवाल सीधे सीधे मनुष्य की खुशहाली का नहीं, बल्कि यह है कि मुनाफा कैसे आयेगा, और क्या मुनाफे का एक हिस्सा आम मनुष्य जीवन को संचालित रखने के लिए लगाया जा सकता है या नहीं।

ऊँच-नीच का फ़ाफ़ड़ा, मुनाफ़े ने मारा झापड़ा

जहाँ पहले के स्तर की उत्पादकता में काम के आँठ घंटों में कुछ हजार-दस हजार के दायरे का माल बनाया जाता था, आज के स्तर पर यह दायरा कई दस हजारों से लाखों के बीच का है। यह कहने की जरूरत नहीं कि मजदूरों की तनखा में इस पैमाने की बढ़त नहीं हुई है। नतीजा यह है कि समाज में उत्पादकता के बढ़ने के साथ मजदूरी और उत्पादन के बीच की असमानता बहुत तीव्रता से बढ़ी है। आज के दौर में श्रम करनेवाले यह देख रहे हैं कि उनके द्वारा बनाई वस्तुओं की दुनिया उनके लिए ही मेहंगी पड़ रही है। और तो और, क्योंकि उनको इस दुनिया में जीवित रहने के लिए अधिकाधिक उत्पादन करना पड़ रहा है, यह दुनिया उनसे अधिक से अधिक काम निचोड़ रही है।

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